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दो शब्द दृश्य (गणेश जी बाग़ी)

प्रथम दृश्य : शांति

===========

माँ ने लगाया
चांटा...
मैं सह गयी,

पापा ने लगाया
थप्पड़..
मैं सह गयी,

भाई ने मारा
घूंसा..
मैं सह गयी,

घर से बाहर छेड़ते थे
आवारा लड़के
मैं चुप रही,

पति पीटता रहा
दारू पीकर
मैं चुप रही,

सास ससुर
अपने बेटे की
करते रहे तरफ़दारी
उसकी गलतियों पर भी
मैं चुप रही,

मैं सदैव चुप रही
ताकि बनी रहे
घर मे शांति,

किंतु...
मैं सदैव असफल रही
शांति कायम करने में ।

---------------------------

द्वितीय दृश्य : शांति

============

माँ ने लगाया
चांटा...
मैं रोयी, चिल्लाई,

पापा ने लगाया
थप्पड़...
मैंने नही खाया खाना
दो दिनों तक,

भाई ने मारा
घूँसा...
मैंने की उसकी शिकायत
माँ - पापा से,

घर से बाहर
छेड़ा था
एक आवारा
मैंने दिखाया था उसे
कराटे का दाँव,

पति ने दारू पीकर
उठाया हाथ...
मैंने पकड़ ली कलाई..
तबसे
सास ससुर
अपने बेटे की
नहीं करते तरफ़दारी
उसकी गलतियों पर,

मैं करती रही
विरोध
जो मुझे गलत लगा
ताकि बनी रहे
घर मे शांति

और....
मैं सदैव सफल रही..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 4, 2020 at 7:45am

आ. भाई गणेश जी बागी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 29, 2020 at 8:49pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी 'बाग़ी' जी।बेहतरीन प्रस्तुति।

Comment by Samar kabeer on February 28, 2020 at 11:39am

जनाब गणेश जी 'बाग़ी' साहिब आदाब, अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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