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"गृहस्थी को ठीक ठाक से चलाते हुए कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।"
मनोज के मन में भारी द्वन्द्व चल रहा था।
अचानक पड़ी कठिनाई को हल कर पाने में स्वयम् को असमर्थ और असहाय महसूस कर रहा था वह।गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में दिमाग़ में आया अभी ही का विचार उसकी पीड़ा से धुन्धला हुआ जा रहा था।और उसने इह लीला समाप्ति को ही सभी समस्याओं का एक मात्र एवम् सम्पूर्ण हल समझ लिया।गहन गर्मी की उस दोपहर में मनोज सिर से सापा खोल अपने इरादे पर मुहर लगाने के लिए उसे हाथ में ले पेड़ पर चढ़ने लगा।
"पेड़ की टहनी पर बैठकर गर्मी कम लगती है क्या?"
अचानक एक अज़नबी आवाज ने उसे चौकाया।
"पेड़ पर चढ़े जा रहे हो,इस लिए पूछा।अगर ऐसा है तो पहले मुझे चढ़ाओ। मेरा एक पैर काम नहीं करता।"
मनोज ने ठिठक कर देखा,आंगतुक एक टांग से लँगड़ा था।
"अरे नहीं.......!मैं ......तो....... ऐसे...... ही बस.....।आओ नीचे ही बैठते है।"
वृक्ष के नीचे दोनों बैठ गए।
मनोज ने पूछना चाहा,"भाई तुम........"
"मैं....मैं यहाँ अज़नबी ही हूँ। बड़ी मेहनत से अपना परिवार पाल रहा हूँ। यहीं पास के गाँव में मेरी बुआ दादी रहती है।कभी कभार तंगी में उनकी मदद करने आ जाता हूँ।अब यहां उनका कोई नहीं रहता।सो मैं ही.....।"
"तुम करते क्या हो भाई?और परिवार में और कौन है?"
"मैं खड्डी में बुनाई का काम करता हूँ।परिवार में पत्नी और बिटिया है।"
"तुम....... ठीक....... से काम ......कर लेते हो।"
थोड़ा सकुचाते हुए मनोज पूछ पाया।
"हा हा मेरी अपंगता को मैं लाचारी मान लेता तो ज़िन्दगी खत्म थी।हिम्मत और इच्छाशक्ति इंसान को पुनर्जीवन देती है।गृहस्थी को सम्भालने में मदद करती है।"
ऐसा कहकर आगन्तुक उठकर अपनी राह चल दिया।
अप्रकाशित एवम् मौलिक

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:41pm
सकारात्मक प्रतक्रिया देकर आशीर्वाद देने के लिए सादर आभार आ डॉ विजय शंकर सर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:39pm
मेरी इस रचना पर सकारात्मक टिप्पणी कर हौंसला बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार आ जयप्रकाश जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2015 at 12:36pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय शैख़ सहज़ाद जी प्रस्तुति को पढ़ने एवम् हौसला अफ़जाई के लिए।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2015 at 11:05am
प्रेरक लघु - कथा , आदरणीय सतविंदर कुमार जी।
Comment by Jayprakash Mishra on October 8, 2015 at 9:34am
Laghukatha k dwaar samaaj ke udas logon ke liye achchha sandesh, Badhaai Satavinder ji
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:32am
वाह, बहुत ही प्रेरक और उत्कृष्ट लघु कथा का सृजन हुआ है आदरणीय सतविंदर कुमार जी।बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको।
_शेख़ शहज़ाद उस्मानी

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