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ज़ुबान कुछ शिकायती भी कीजिए कभी कभी (133 )

ज़ुबान कुछ शिकायती भी कीजिए कभी कभी
निज़ाम से तनातनी भी कीजिए कभी कभी
**
हयात के लिए हैं दोस्त ख़ुश्क़ अश्क पुरख़तर
फुगाँ की रस्म अदायगी भी कीजिए कभी कभी
**
विसाल और हिज्र के मज़े भी हैं जुदा जुदा
सुपुर्द-ए-हिज्र ज़िंदगी भी कीजिए कभी कभी
**
कशीदगी गमों से हम निभा सकेंगे कब तलक
ज़रा ग़मों से दोस्ती भी कीजिए कभी कभी
**
यक़ीन है हमें कि होंगी दिल में बारिश-ए-सुकूं
जनाब फ़िक्र-ए-मुफ़्लिसी भी कीजिए कभी कभी
**
गुहर तलाशने अगर हैं आपको समाज में
निगाह अपनी पारखी भी कीजिए कभी कभी
**
मिलेगा क्या किसे बताएँ छेद कर ये आसमाँ
ज़मीन नर्म खेत की भी कीजिए कभी कभी
**
हवस बदन की बस मिटाना ही समझते प्यार क्या
मुहब्बतें अनार-सी भी कीजिए कभी कभी
**
अलम उठा रखा 'तुरंत' क़ाफ़िरी का आपने
मगर सनम की बंदगी भी कीजिए कभी कभी
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 17, 2021 at 8:45pm

 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी , 

जी, आद. आपका अनमोल आशीर्वाद पा कर मेरा लिखना सार्थक हो गया. आदर सहित कोटिशः धन्यवाद

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 17, 2021 at 8:44pm

Aazi Tamaam  साहेब आपकी हौसला आफ़जाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया एवं सादर नमन | 

Comment by Aazi Tamaam on June 17, 2021 at 11:06am

बेहद सुंदर ग़ज़ल है सर

सादर प्रणाम आ तुरन्त जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 16, 2021 at 8:51am

आ. भाई गिरधारी जी, अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

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