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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४१ (बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़: "बात क्यूँ करते हो मुझसे इश्रतोआराम की")

बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़

(वज़न- फायलातुन फायलातुन फायलातुन फाएलुन)

---------------------------------------------------------

मुलाहिजा फरमाएं:

 

बात क्यूँ करते हो मुझसे इश्रतोआराम की

हुस्नवालों की दलीलें हैं मिरे किस काम की

 

कब हुई तस्लीम मेरी इक ज़रा सी इल्तेजा

दास्तानें कब हुईं मंसूख तेरे नाम की

 

जाग जाओ सोने वालो अपने मीठे ख्वाब से   

घंटियाँ बजने लगी हैं शह्र में आलाम की

 

पीछे पीछे नामाबर…

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Added by राज़ नवादवी on October 19, 2012 at 11:51pm — 8 Comments

ग़ज़ल-- एक छोटी सी कोशिश

 देखते ही देखते दिन रात बदल जाते है

पल में लोग अपनी बात बदल जाते है



यूँ बदल गई आब-ओ-हवा मेरे शहर की

घर देख कर यहाँ अब ताल्लुकात बदल जाते हैं



न कर गुरुर बन्दे मेयार-ए-ख़ुद पर

कौन जाने कब किसके हालत बदल जाते हैं



रह गई है मौहब्बत की इतनी ही हकीक़त

रोज आशिको के अब जज्बात बदल जाते हैं



होती है आरजू-ए-मुकतला यहाँ सभी को 

तकदीरे कभी तो कभी ख्वाहिशात बदल जाते है



क्या करें जहाँ में ऐतबार अब किसी का

जब…

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Added by Sonam Saini on October 19, 2012 at 9:34am — 13 Comments

फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो|

कभी गुलामी के दंशों ने , कभी मुसलमानी वंशों ने

मुझे रुलाया कदम कदम पर भोग विलासीरत कंसो ने

जागो फिर से मेरे बच्चों शंख नाद फिर से कर डालो

फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो||



मनमोहन धृष्टराष्ट बन गया कलयुग की पहचान यही है 

गांधारी पश्चिम से आकर जन गण मन को ताड़ रही है

भरो गर्जना लाल मेरे तुम माँ का सब संकट हर डालो

फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो…

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Added by Manoj Nautiyal on October 19, 2012 at 7:18am — 5 Comments

हमारे हौसले

हमारे हौसले अब भी उन्हें छू कर निकलते हैं 

उन्हें शक है मुहोब्बत में कई शोले पिघलते हैं ।।



कोई अनजान सा गम है जुदाई के पलों का भी 

ये कैसी आग है जिसमे बिना जल कर सुलगते हैं ।।



खफा होती हुयी जब भी दिखाई दी हमें चाहत 

खता कुछ भी नहीं रहती बिना कारण चहकते हैं ।।



सुना है आज कल उनकी गली में हुश्न तनहा है 

घडी भर दीद करने को भला क्यूँ कर हिचकते हैं…

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Added by Manoj Nautiyal on October 19, 2012 at 7:16am — 2 Comments

कजरी गीत: गौरा वंदना --संजीव 'सलिल'

कजरी गीत:

गौरा वंदना

संजीव 'सलिल'

*

गौरा! गौरा!! मनुआ मानत नाहीं, दरसन दै दो रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!! तुम बिन सूना है घर, मत तरसाओ रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!!  बिछ गये पलक पाँवड़े, चरण बढ़ाओ रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!! पीढ़ा-आसन सज गए, आओ बिराजो रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!! पूजन-पाठ न जानूं, भगति-भाव दो रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!! कुल-सुहाग की बिपदा, पल में टारो रे गौरा!

*

गौरा! गौरा!! धरती माँ की कैयाँ हरी-भरी हो रे गौरा!…

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 18, 2012 at 11:00am — 1 Comment

नवरात्री की शुभकामनाएँ

दर्द को होंठों की मुस्कान बना देती है,
मौत को जीने का सामान बना देती है.
याद करता हूँ मैं जब भी "माँ" को दिल से,
हर मुसीबत को आसान बना देती है.


(नवरात्री की शुभकामनाएँ)

Added by लतीफ़ ख़ान on October 18, 2012 at 10:30am — 1 Comment

अब भी चाँद चमकता है

अहा!अब भी चाँद चमकता है
तुम अब भी प्यारी लगती हो.
यूँ अब भी प्यार भटकता है
तुम दुनिया सारी लगती हो !

वो कल के बीते ताने-बाने
तुम आज कहानी लगती हो
वो सुन्दर खाब के अफसाने
तुम जानी पहचानी लगती हो!

देखो,वो सरगम वो साज सभी
तुम मेरी निशानी लगती हो.
मुझे बीता कल सब याद अभी
तुम परियों की रानी लगती हो !! .

Added by Raj Tomar on October 17, 2012 at 11:00pm — No Comments

महंगाई

महंगाई 

महंगाई ने कुछ ऐसा रंग दिखाया है 

आम सी दाल को भी खास बनाया है

जो दाल रोटी खा प्रभु के गुण गाते थे 

प्रभु को भूल आज,वो दाल की पूजा कर जाते हैं 

फास्ट फ़ूड खाने वाला आज दाल भी शौक से खाता है 

सूट पहनकर इतराता हुआ खुद के रौब दिखाता है 

धरती की दाल को आसमान…

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Added by Ranveer Pratap Singh on October 17, 2012 at 10:44pm — 4 Comments

है भीतर कुछ ऐसा बैठा

देखा है कई बार

अनीति के बढ़ते क़दमों को

शिखर तक जाते हुए

देखा है कई बार

दुष्टों को....सूर्य पर मंडराते हुए



किन्तु कभी नहीं सोचा

कि होकर शामिल उनमें

मैं भी पाऊं सामीप्य गगन का/



ना ही सोचा कि मैं छोडूं

धरा नीति की

और विराजूं उड़ते रथ में/

है भीतर कुछ ऐसा बैठा

देता नहीं भटकने पथ में/

हे ईश् मेरे कहीं वो तुम तो नहीं



देखा है कई बार

सत्य को युद्धरत/

क्षत विक्षत...आहत/

सांस तक लेने के…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on October 17, 2012 at 10:23pm — 4 Comments

ग़ज़ल

चारागर की ख़ता नहीं कोई.

दर्दे-दिल की दवा नहीं कोई.



आप आये न मौसमे-गुल में,

इससे बढ़कर सज़ा नहीं कोई.



ग़म से भरपूर है किताबे-दिल,

ऐश का हाशिया नहीं कोई.



देख दुनिया को अच्छी नज़रों से,

सब भले हैं बुरा नहीं कोई.



सच का हामी है कौन पूछा तो,

वक़्त ने कह दिया नहीं कोई.



है सफ़र दश्ते-नाउम्मीदी का,

मौतेबर रहनुमा नहीं कोई.



अपने ही घर में हैं पराये हम,

बेग़रज़ राबता नहीं कोई.



इस…

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Added by लतीफ़ ख़ान on October 17, 2012 at 6:00pm — 8 Comments

मलाला को समर्पित एक रचना

कुहरीले जंगल में हंसती

हरी हवा सी चलती हूं

मुक्‍त  गगन से गिरी ओस हूं

तृण टुनगों पर पलती हूं

 

हू हू करता आंख दिखाता

रे तमस किसे भरमाता है

देख मेरा बस एक नाद ही

कैसे तुझे जलाता है

 

अभी जरा निष्‍पंद पड़ी हूं

कहां अभी तक हारी हूं

भूल न करना मरी पड़ी हूं

अबला,बाल,बेचारी हूं

 

अरे कुटिल यह चाप तुम्‍हारा

वृथा चढ़ा रह जाएगा

तेरा ही तम कहीं किसी दिन

तुझको भी डंस…

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Added by राजेश 'मृदु' on October 17, 2012 at 5:02pm — 3 Comments

जनता का संयम

हमने चुना था सोंचकर, इनमे उनके वंश का ही खून है 

वे स्वर्ग से बहाते आंसू, लजाया इसने मेरा ही खून है |

 
हमने चुना था सुनकर, उनने किये थे जो पक्के वादे,
हमें क्या पता था मन में,उनके थे कुछ और ही  इरादे|…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 17, 2012 at 4:51pm — No Comments

यह मेरा दर्द है

यह मेरा दर्द है
 

यह मेरा दर्द है,आँखों से छलक आता है

यूँ ही पैमाना,बदनाम हुआ जाता है



लाख कह ले यह ज़माना,न जीना आया हमें

वक़्त अच्छा हो बुरा हो,गुज़र तो जाता है



सबको हँसता हुआ देख लूँ,मैं चला जाऊँगा

यूँ भी "दीपक" जलनें से कहाँ बच पाता है



मैं न अपनों को याद आऊँ,न गैरों को

प्यार उस हद तक मेरा मुझको,नज़र आता है…

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 17, 2012 at 1:00pm — 3 Comments

गायत्री छंद 'सिर्फ एक प्रयोग' गायत्री मंत्र की तरह

================गायत्री छंद=====================



यह इस छंद पर सिर्फ एक प्रयोग है अंतरजाल के माध्यम से मिली जानकारी के अनुसार

२४ वर्णों के इस छंद में इसमें तीन चरण होते हैं

इस छंद का इक विधान जो गायत्री मंत्र की तरह ही है

विधान -\\१ भगण १रगण १ मगण १ तगण......१ भगण १ यगण १ रगण १ जगण\\…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 17, 2012 at 12:00pm — No Comments

मेरे हमसफर

ओ मेरे  हमसफर ओ हमदम मेरे 
मेरी आँखों में देख तस्वीर अपनी 
जो बन चुकी है अब तकदीर मेरी 
बह चली मै अब बहती हवाओं में 
उड़ रही हूँ हवाओं में संग तुम्हारे 
इस से पहले कि रुख  हवाओं का 
न बदल जाये कहीं थाम लो मुझे  
कहीं ऐसा न हो शाख से टूटे हुये
पत्ते सी भटकती रहूँ दर बदर मै
जन्म जन्म के साथी बन के मेरे 
ले लो मुझे आगोश में तुम अपने 
ओ…
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Added by Rekha Joshi on October 17, 2012 at 11:57am — 7 Comments

रक्षक ही भक्षक

रक्षक ही भक्षक 
जांच अगर हो कायदे से 
कोई बच न पाए
भारत में बच्चे से बूढ़ा
घूसखोर  नज़र आए
बड़े बड़े घोटाले यहाँ पर
मामूली सा खेल है
बच्चे को जब तक दो न चॉकलेट
वह भी स्कूल न जाए
कब तक लड़ेंगे अन्ना हजारे
कब तक केजरी वाल 
हर शाख पे उल्लू बैठा…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 17, 2012 at 11:44am — 3 Comments

वही हँसाता है हमें, वही रुलाता है

वही हँसाता है हमें, वही रुलाता है

गम ओर ख़ुशी देकर आज़माता है

 

अपनों की अहमियत भी सीखाता है

बिछुडों को फिर वही मिलाता है

 

यकीं खुदा का तो बड़ा सीधा है

मारता है वही,वही जिलाता है

 

इसका उसका क्या है जग में

सबका हिस्सा तो वही बनाता है

 

नेमतें उसकी तो बड़ी निराली है

छीनता है कभी,कभी  दिलाता है

 

मेरे घर में कभी तुम्हारे घर में

खुशियाँ भी तो वही पहुँचाता है

 

आखिर भूले…

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Added by नादिर ख़ान on October 17, 2012 at 11:15am — No Comments

छुपा सकता है

छुपा सकता है 
 

यह हिन्दोस्तान है प्यारे 

यहाँ कुछ भी हो सकता है
ख़ाली जगह में स्थापित मूर्ति पर 
बोर्ड प्राचीन मंदिर का लग सकता है
आस्था के नाम पर 
यहाँ बहुत कुछ होता है
हर एक तिलकधारी 
बाबा नहीं होता है 
जिसमें दम हो वह जहाँ चाहे 
कब्ज़ा जमा सकता है
इन्हीं धर्मस्थलों की आड़ में 
अपने कुकर्म छुपा सकता…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 17, 2012 at 10:52am — No Comments

"गायत्री छंद" आप सभी को शारदीय नवरात्र की अनेकानेक शुभकामनाएं



आप सभी को शारदीय नवरात्र की अनेकानेक शुभकामनाएं

"गायत्री छंद"

विधान -\\१ भगण १रगण १ मगण १ तगण......१ भगण १ यगण १ रगण १ जगण\\

२ १ १ -  २ १ २  - २ २ २  - २ २ १     ,     २ १ १  - १ २ २  - २ १ २   - १ २ १



माँ कमला सती दुर्गा दे दो भक्ति, हो तुम अनंता माँ महान शक्ति ||…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 17, 2012 at 10:30am — No Comments

लेख: हमारे सोलह संस्कार --संजीव 'सलिल'

लेख:

हमारे सोलह संस्कार

संजीव 'सलिल'

*

अर्थ:

'संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणकानेन, दोषपनयेन वा' अर्थात गुणों के उत्कर्ष तथा दोषों के अपकर्ष की विधि ही संस्कार है।

शंकराचार्य के ब्रम्ह्सूत्र के अनुसार किसी वस्तु, पदार्थ या आकृति में गुण, सौंदर्य, खूबियों को आरोपित करना / बढ़ाना  तथा उसकी त्रुटियों, कमियों, दोषों को हटाने / मिटने का नाम संस्कार है।

संस्कृत भाषा में प्रयुक्त क्रिया (धातु) 'कृ' के पूर्व सम उपसर्ग तथा पश्चात् 'आर' कृदंत के संयोग से बने इस शब्द…

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 16, 2012 at 10:09pm — 1 Comment

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