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Sushil Sarna's Blog (896)

तीर चलते हैं मगर

तीर चलते हैं मगर तरकश नजर नहीं आता

चाहत में निगाहों को सफर नजर नहीं आता



अंजाम जान के भी पलकों में घर बनाते हैं

क्यूँ दिल टूटने का उन्हें हश्र नजर नहीं आता



आसमान को छूने की तमन्ना करने वालो

क्यों ज़मीं पर तुम्हें टूटा पंख नजर नहीं आता



लगा दिया इल्जाम बेवफाई का उनके सर

क्यूँ आँख से गिरा अश्क नजर नहीं आता



जिस तकिये पे मिल कर गुजारी थी रातें

उस भीगे तकिये का दर्द नजर नहीं आता



सुशील सरना



मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on December 25, 2013 at 12:30pm — 14 Comments

प्रेम तृणों से .

प्रेम तृणों से  …….

पलक पंखुड़ी में प्रणय अंजन से 

सुरभित संसृति का श्रृंगार करो 

भ्रमर गुंजन के मधुर काल में 

कुंतल पुष्प श्रृंगार करो 

तृप्त करो तुम नयन तृषा को 

मिलन क्षणों को स्वीकार करो 

अपने उर में अपने प्रिय की 

अनुपम सुधि से श्रृंगार करो 

विस्मृत कर…

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Added by Sushil Sarna on December 20, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

दर्द का सावन

दर्द का सावन ……

.

दर्द का सावन तोड़ के बंधन

नैन गली से बह निकला

मुंह फेर लिया जब अपनों ने

तो बैगानों से कैसा गिला

 

जो बन के मसीहा आया था

वो बुत पत्थर का निकला

मैं जिस को हकीकत समझी थी

वो रातों का सपना निकला

है रिश्ता पुराना कश्ती का

सागर के किनारों से लेकिन

जब दुश्मन लहरें बन जाएँ

तो कश्ती से फिर कैसा…

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Added by Sushil Sarna on December 19, 2013 at 7:00pm — 18 Comments

ये कैसी आधुनिकता है ….

ये कैसी आधुनिकता है …. …..

.

उफ्फ !

ये कैसी आधुनिकता है ….

जिसमें हर पल …..

संस्कारों का दम घुट रहा है //

हर तरफ एक क्रंदन है ….

सभ्यता आज ….

कितनी असभ्य हो गयी है //

आज हर गली हर चौराहे पर ….

शालीनता अपनी सभी …..

मर्यादाओं की सीमाएं तोड़कर हर ……

शिष्टाचार की धज्जियां उड़ा रही है //

बदन का सार्वजनिक प्रदर्शन …..

आधुनिकता का अंग बन गया…

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Added by Sushil Sarna on December 16, 2013 at 7:30pm — 17 Comments

कसमों के गाँव

वादों की ..सडकों पे

कसमों के …गाँव हैं

प्रणय के ..पनघट पे

आँचल की ..छाँव है

…वादों की सडकों पे

…कसमों के गाँव हैं

प्रीतम की ……बातें हैं

धवल चांदनी …रातें हैं

सुधियों की .पगडंडी पे

अभिसार के ….पाँव हैं

…वादों की सडकों पे

…कसमों के गाँव हैं

शीत के …धुंधलके में

घूंघट की …..ओट में

प्रतिज्ञा की .देहरी पर

तड़पती एक .सांझ है

…वादों की सडकों पे

…कसमों के…

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Added by Sushil Sarna on December 10, 2013 at 1:00pm — 16 Comments

उधार के निशान..

किसी गली के नुक्कड़ पर

लगा दीजिये

किसी भी प्रसिद्ध नाम का पत्थर

वो उस गली की

पहचान हो जायेगा

वो नाम

सबकी जान हो जायेगा

कभी गलती से

किसी ने अगर उस पत्थर को

तोड़ने की कोशिश भी की तो

दंगाईयों का काम

आसान हो जायेगा

जी हाँ

नेताओं के लिए

चुनाव के निशान

पुजारी के लिए

तिलक के निशान

उनकी जान होते है

उनके व्यवसाय की

पहचान होते हैं

जाने क्योँ

लोग वाह्य आवरण को

अपनी पहचान…

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Added by Sushil Sarna on December 9, 2013 at 4:30pm — 12 Comments

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….



कितने

वज्र हृदय हो तुम

इक बार भी तुमने

मुड़कर नहीं देखा

तुम्हारी एक कंकरी ने

शांत झील में

वेदना की

कितनी लहरें बना दी

और तुम इसे एक खेल समझ

होठों पर

हल्की सी मुस्कान के साथ

मेरे हाथों को

अपने हाथों से

थपथपाते हुए

फिर आने का आश्वासन देकर

मुझे

किसी गहरी खाई सा

तनहा छोड़कर

कोहरे में

स्वप्न से खो गए

और मैं

तुम्हें जाते हुए

यूँ निहारती रही…

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Added by Sushil Sarna on December 7, 2013 at 5:30pm — 11 Comments

***हमसाया हो जाएगा ….***

हमसाया हो जाएगा ….
.
जब जिस्म से
साँसों का बंधन टूट जाता है
विछोह की वेदना में
हर शख्स शोक मनाता है
शोक में दुनियादारी के लिए
चंद अश्क भी बहाए जाते है
आपसी मतभेद छुपाये जाते हैं
याद किया जाता है उसके कर्मों को
उससे अपने प्रगाड़ सम्बन्धों के 
मनके गिनवाए  जाते  हैं…
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Added by Sushil Sarna on December 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments

***इक पल मैं हूँ..........***

इक पल मैं हूँ..........



इक पल मैं हूँ इक पल है तू

इक पल का सब खेला है

इक पल है प्रभात ये जीवन

इक पल सांझ की बेला है

इक पल मैं हूँ..........

ये काया तो बस छाया है

इससे नेह लगाना क्या

पूजा इसकी क्या करनी

ये मिट्टी का ढेला है

इक पल मैं हूँ..........

प्रश्न उत्तर के जाल में उलझा

मानव मन अलबेला है

क्षण भंगुर इस जिस्म में लगता

साँसों का हर पल मेला…

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Added by Sushil Sarna on December 2, 2013 at 10:00pm — 14 Comments

***बुजुर्ग को सुनाते हैं …..***

बुजुर्ग को सुनाते हैं …..



हाँ

मानता हूँ

मेरा जिस्म धीरे धीरे

अस्त होते सूरज की तरह

अपना अस्तित्व खोने लगा है

मेरी आँखों की रोशनी भी

धीरे धीरे कम हो रही है

अब कंपकपाते हाथों में

चाय का कप भी थरथराता है

जिनको मैं अपने कंधों पर

उठा कर सबसे मिलवाने में

फक्र महसूस करता था

वही अब मुझे किसी से मिलवाने में

परहेज़ करते हैं

शायद मैं बुजुर्ग

नहीं नहीं बूढा बुजुर्ग हो गया हूँ

मैं अब वक्त बेवक्त की चीज़ हो गया हूँ…

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Added by Sushil Sarna on December 1, 2013 at 6:12pm — 20 Comments

***पेशानी पे मुहब्बत की यारो ……….***

पेशानी पे मुहब्बत की यारो ……….

लगता है शायद 

उसके घर की कोई खिड़की 

खुली रह गयी 

आज बादे सबा 

अपने साथ 

एक नमी का 

अहसास लेकर आयी है 

इसमें शब् का मिलन और 

सहर की जुदाई है 

इक तड़प है 

इक तन्हाई है 

ऐ खुदा 

तूने मुहब्बत भी 

क्या शै बनाई है 

मिलते हैं तो 

जहां की खबर नहीं रहती 

और होते हैं ज़ुदा 

तो खुद की खबर नहीं रहती 

छुपाते…

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Added by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 2:00pm — 20 Comments

***ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......***

ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......

ऐ सांझ ..

तू क्यूँ सिसकती है //

अभी कुछ देर में ..

तिमिर घिर जाएगा …

तिमिर की चादर में …

हर रुदन छुप जाएगा //

रुदन …

उस क्षण का …

जब एक ….

किलकारी ने ….

अपनी चीख से ब्रह्मांड में ….

सन्नाटा कर दिया //

रुदन उस क्षण का ….

जब एक कोपल …

एक वहशी की वासना का ….

शिकार हो गयी //

रुदन उस क्षण का …..

जब दानव बना मानव ……

दरिंदगी की सारी हदें …..

पार कर गया //

रुदन उस…

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Added by Sushil Sarna on November 29, 2013 at 3:12pm — 18 Comments

चंद मुक्तक

1. .....कुछ दीप जलते रह गए …



शायद हमारे प्यार के ....कुछ शब्द अधूरे रह गए

कुछ सकुचाये इकरार से ...कुछ नज़र से बह गए

मासूम लौ निर्बल हुई कम्बखत पवन के जोर से

कहने कहानी प्यार की ..कुछ दीप जलते रह गए

...............................................................................

2. ..........जिस्म तेरी यादों का ....

कफ़स बन के रह गया है .....ये जिस्म तेरी यादों का

सह रहा है अज़ाब कितना .अब ये दिल टूटे वादों का

अब तलब…

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Added by Sushil Sarna on November 27, 2013 at 1:00pm — 14 Comments

***मैं बहुत हेट करती हूँ ……………***

मैं बहुत हेट करती हूँ ……………



हेट हेट हेट

हाँ

मैं बहुत हेट करती हूँ

ये लव

मुहब्बत

और

प्यार जैसे

सब लफ़्ज़ों से

मुझे…

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Added by Sushil Sarna on November 26, 2013 at 12:30pm — 18 Comments

जीवन का आधार.......

जीवन का आधार........

 

हर सांस

ज़िंदगी के लिए

मौत से लड़ती है

हर सांस

मौत की आगोश से

ज़िंदगी भर डरती है

अपनी संतुष्टि के लिए वो

अथक प्रयास करती है

मगर कुछ पाने की तृषा में

वो हर बार तड़पती है

तृषा और तृप्ति में सदा

इक दूरी बनी रहती है

विषाद और विलास में

हमेशा ठनी रहती है

ज़िंदगी प्रतिक्षण 

आगे बढ़ने को तत्पर रहती है

और उसमें जीने की ध्वनि

झंकृत होती…

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Added by Sushil Sarna on November 25, 2013 at 12:00pm — 15 Comments

ख़्वाबों की हसीन शाम दें ………

ख़्वाबों की हसीन शाम दें ………



क्यूँ

बेवज़ह की

तकरार करती हो

इकरार भी करती हो

इंकार भी करती हो

खुद ही रूठ कर

छुप जाती हो

अपने ही आँचल में

झुकी नज़रों से

फिर किसी के

मनाने का

इंतज़ार भी करती हो

तुम जानती हो

तुम मेरी धड़कन हो

तुम मेरी साँसों की वजह हो

हम इक दूसरे की

पलकों के ख्वाब हैं

कोई अपने ख्वाबों से

रूठता है भला

तुम्हारा ये अभिनय बेमानी है

वरना इस ठिठुरती रात के…

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Added by Sushil Sarna on November 21, 2013 at 1:30pm — 11 Comments

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