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पुस्तक समीक्षा : “दर्पण .... एक उड़ान कविता की”

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिखाता काव्य संग्रह

वर्तमान अंकुर के संयोजन में, एकल पुस्तक संग्रह की श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित काव्यसंग्रह, “दर्पण... एक उड़ान कविता की” रत्ना पांडे जी का एक वैचारिक काव्य संग्रह है। वड़ोदरा गुजरात की रहने वाली रत्ना पांडे की काव्य लेखन में बेहद रूचि है। इस काव्य संग्रह से पूर्व, वह कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब मैगजीन में प्रकाशित हो चुकी है।

   “दर्पण... एक उड़ान कविता की” एक ऐसा काव्य संग्रह है, जो अपने शीर्षक के ही अनुसार समाज एवं समाज के लोगों को आईना दिखाता है। उनके प्रत्येक कविता में व्यक्ति अपने आसपास की तथा अपने अंतरात्मा की बुराइयों को अपने सामने देखता है।

‘अधूरी ख्वाहिश’ कविता में लेखिका अपने समाज में व्याप्त बुराइयों को बदलने के लिए शस्त्र नहीं बल्कि कलम को हथियार बनाना चाहती हैं।

शस्त्र से नहीं समस्याओं को अभिव्यक्ति से हल करना होगा

यही उद्देश्य है मेरा ...यही संकल्प है मेरा...”

‘बेटी को बेटी ही रहने दो’, ‘छोड़ दूंगी वह गली’, ‘अंतिम विदाई’ इत्यादि कविताओं में लेखिका ने स्त्री की संवेदनाओं को बड़े ही मार्मिकता से व्यक्त किया है। एक बेटी, एक युवती, तथा एक वृद्धा की परिस्थितियों का विवरण दिल को छू जाता है। आम आदमी को हताशा के अंधेरे से निकालती उनकी कविता ‘उम्मीद का दामन थाम ले तू’ अवश्य ही पाठकों के मन का द्वार खटखटाएगी।

निराशा मन की कौंध रही थी,

एक आशा का दीप दिख जाए ,

नजरें उसे ही खोज रही थी”।

प्रकृति की सुंदरता का बखान ‘गांव हमारे वापस दो’ पढ़कर हर वह शहरी जो गांव से संबंध रखता है एक बार उसकी आंखें जरूर भर आएंगी । उनकी कई कविताएं जहां धर्म, सामाजिक बुराइयां, परंपराओं इत्यादि की सच्चाइयों से अवगत कराती है वहीं कई कविताएं फौजी, किसान, एन आर आई, बाल श्रमिक, राजनीतिज्ञ, पर्यावरण इत्यादि पर भी प्रकाश डालती है।  ‘चांद और सूरज का दर्द’ भी उनकी लेखनी से निकलकर मानवीय रूप को साकार कर रहा है।

डॉक्टर एवं मीडिया की लापरवाही तथा संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिखती है, उनकी एक कविता ‘मर गया मरीज डॉक्टर बिल फाड़ते रहे’ में। आज अस्पतालों में सचमुच ऐसी ही परिस्थिति है। ऐसा लगता है जैसे मानवता आज लुप्त हो चुकी है। इंसानी जिंदगी की कीमत कागज के चंद टुकड़ों में सिमट कर रह गई हैं।

इसी प्रवाह में कविताएं आगे बढ़ती हुई ‘नाले की पुकार’ पर थोड़ा सा थमती हैं, तो कहीं किसी अदालत में ‘फंस गई गीता सच-झूठ के माया जाल में’ जाकर उसकी पैरोकार भी करती है। कहीं ‘सूर्य का धैर्य’ असहनीय सा प्रतीत होता है तो कहीं ‘कविता ....’ स्वयं को विचारों, भावनाओं एवं हादसों के रूप में किताब के पन्नों में सजी-संवरी दिख जाती है।

कविताओं की यह श्रृंखला समाप्त भी होती है तो ‘इंतजार..’ पर जहां एक पिता अपने बेटों की राह देखता है, तो वहीं पाठक वर्ग के सामने एक ऐसा दर्पण आ जाता है जहां हर व्यक्ति अपना भविष्य ...अपना सांध्यकाल देखता है। कविताएं कवि, के मन का उद्गार होती हैं। यहां हर कविता में रत्ना पांडे जी का अनुभव एवं उनकी संवेदनाएं स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। वर्तमान अंकुर एवं रत्ना पांडे जी को इस काव्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर

 

 

पुस्तक का नाम

दर्पण.... एक उड़ान कविता की

लेखिका

रत्ना पांडे

रचना-पद्धति

काव्य

प्रकाशक

वर्तमान अंकुर

प्रकाशन माह / वर्ष

सितम्बर, 2018

मूल्य

रूपये 295 /-


Views: 858

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