For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,

जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-115

विषय - "घर परिवार"

आयोजन अवधि- 09 मई 2020, दिन शनिवार से 10 मई 2020, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.

ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन ’घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो - 09 मई 2020, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.

महा-उत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
"OBO लाइव महा उत्सव" के सम्बन्ध मे पूछताछ

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करें

मंच संचालक
ई. गणेश जी बाग़ी 
(संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम परिवार

Views: 3342

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

आवश्यक है ध्यान सभी दें
संकट में है अब घर बार |
**
कहीं अर्थ की कमी लग रही
इस संकट का कारण एक |
संतानों के कहीं इरादे
रहे नहीं अब शायद नेक |
और कहीं पर धन दौलत का
भरा हुआ अतुलित भंडार |
तार तार करता है चादर
सम्बन्धों की कभी-कभार |
राखी को कर रहे पराई
आज वसीयत के कानून,
बहनों के ख़ातिर है ग़ायब
भाई-भावज का अब प्यार |
**
आवश्यक है ध्यान सभी दें
संकट में है अब घर बार |
**
युवा जन तय करते जाते
नित्य सफलता के सोपान |
और उन्नति गढ़ती रहती
रोज़ रोज़ ऊँचे प्रतिमान |
समय किसी के पास नहीं है
रिश्तों को कुछ दे दें वक़्त |
समझ नहीं कि करें वो मन के
उद्गारों को कैसे व्यक्त |
हर पल होती जाती है नित
अपने घर की खंडित सोच,
'लिव-इन' जैसे रिश्तों की अब
सोच नयी लेती विस्तार |
**
आवश्यक है ध्यान सभी दें
संकट में है अब घर बार |
**
नए ज़माने के बच्चों को
कहाँ मिले बरगद की छाँव |
आयाओं की उँगली पकड़े
बचपन आज बढ़ाता पाँव |
आंगल शिक्षा ने सारे ही
लील लिए घर के संस्कार |
बदलावों के आगे मानव
होता जाता है लाचार |
तहस नहस है ढांचा सारा
सांसत में है अब परिवार,
वृद्धाश्रम है आज बन रहा
एक संगठित अब व्यापार |
**
आवश्यक है ध्यान सभी दें
संकट में है अब घर बार |
**
"मौलिक एवं अप्रकाशित "

एक उत्तम प्रस्तुति। बिलकुल सामयिक।

बहुत सुंदर समसामयिक सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करती रचना

हार्दिक बधाई

आ. भाई गिरधारी सिह जी, प्रदत्त विषय पर उत्तम रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

अति सुंदर एवं सामयिक सृजन आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी।

आदरणीय भाई गिरधारीजी

आयाओं की उँगली पकड़े
बचपन आज बढ़ाता पाँव |
आंगल शिक्षा ने सारे ही
लील लिए घर के संस्कार |
बदलावों के आगे मानव
होता जाता है लाचार |
तहस नहस है ढांचा सारा
सांसत में है अब परिवार,
वृद्धाश्रम है आज बन रहा
एक संगठित अब व्यापार |  ... वाह !

हम सब चिंतित हैं इस बदलाव से। अंग्रेजी को स्वीकार कर

हमने अपनी संस्कृति पर स्वयं प्रहार किया है। भुगतना तो

पड़ेगा ही।

पूरी रचना में प्रवाह है हृदय से बधाई

 

 

 

 

 

प्रदत्त विषय पर सुंदर प्रस्तुति हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय

बेहतरीन रचना। 

गीतिका छंद आधारित गीत
2122 2122 2122 212

आधुनिकता में सिकुड़ता, बँट चला परिवार है।
मात्र बच्चे और पत्नी, तक हुआ संसार है


था ज़माना ज़िक्र जब परिवार का होता कभी।
सम्मिलित ताऊ चचा माँ बाप भाई थे सभी।।
नाम बाबा का हमेशा साथ में लेते रहे।
गांव का भी नाम ले परिचय सदा देते रहे।।


हो गया अवसान कोई अब न रिश्तेदार है।
मात्र बच्चे और पत्नी तक हुआ संसार है।।


अब सनातन संस्कृति का, ह्रास होता जा रहा।
वेदशास्त्रों की न शिक्षा, नाम मिटता जा रहा।।
पश्चिमी हम सभ्यता के, रंग में रँगने लगे।
आठ दस वर्षों के बच्चे, भी युवा होने लगे।।


बस जिधर देखो उधर ही, हो रहा व्यभिचार है।
मात्र बच्चे और पत्नी, तक हुआ संसार है।।


आज हरकोई स्वयंभू, कौन किसको मान दे।
यदि हुआ शिक्षित अकिंचन, वह सभी को ज्ञान दे।।
याद कर गुरुकुल प्रथा जब, मात्र शिक्षा लक्ष्य था।
ब्रह्मचारी अल्पहारी, सेव्य गुरु मंतव्य था।।


पश्चिमी देशों से करना , होड़ शिष्टाचार है।
मात्र बच्चे और पत्नी, तक हुआ संसार है।।


हम सनातन संस्कृति में, अनगिनत वर्ष़ों रहे।
मात सम समझा प्रकृति को, कष्ट सब मिल जुल सहे।।
अतिक्रमण होने लगा अब, प्राकृतिक साधन चुके।
दंभ में है चूर मानव, सोचता वह क्यों झुके।।


कर लिया उसने सुनिश्चित, शीघ्र ही संहार है।
मात्र बच्चे और पत्नी तक हुआ संसार है।।


ओम प्रकाश अग्रवाल
क़दम जयपुरी
जयपुर

अप्रकाशित एवं मौलिक रचना

आ. भाई ओम प्रकाश जी, प्रदत्त विषय पर उत्तम गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

आदरणीय आेमप्रकाश अग्रवाल जी, गीतिका छंद में अति सुंदर सृजन हेतु बधाई।

आधुनिकता और प्रदत्त विषय पर सटीक रचना। ऐसी रचना पढ़कर मन शांत भी होता है और अशांत भी। उत्तम।

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Anjuman Mansury 'Arzoo''s blog post ग़ज़ल - सियाह शब की रिदा पार कर गया सूरज
"आ. अंजुमन जी, अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
4 hours ago
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार।सर्, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
7 hours ago
AMAN SINHA posted a blog post

पुरुष की व्यथा

अंतरराष्ट्रीय_पुरुष_दिवस पुरूष क्यूँ रो नहीं सकता? भाव विभोर हो नहीं सकता किसने उससे नर होने का…See More
11 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"बहुत शुक्रिय: भाई शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।"
16 hours ago
Samar kabeer commented on मनोज अहसास's blog post अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास
" // मुझे तो इसकी बह्र ठीक ही लग रही है// बह्र ठीक है, मुझसे ही भूल हुई,क्षमा चाहता हूँ, आप…"
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . मैं क्या जानूं
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई। आ. भाई समर जी की बात से सहमत हूँ…"
20 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए आभार।"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Dr.Prachi Singh posted a blog post

अक्सर मुझसे पूछा करती.... डॉ० प्राची

सपनों में भावों के ताने-बाने बुन-बुनअक्सर मुझसे पूछा करती...बोलो यदि ऐसा होता तो फिर क्या होता ?...…See More
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदाब। ओपनबुक्सॉनलाइनडॉटकॉम के संस्थापक एवं संचालन समीति द्वारा मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब को तरही…"
yesterday
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post अगर हक़ीक़त में प्यार था तो सनम हमारे मज़ार जाएँ (137)
"आदरणीय , समर कबीर साहेब , आपकी हौसला आफ़जाई के लिए दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |"
yesterday
मनोज अहसास commented on मनोज अहसास's blog post अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास
"हार्दिक आभार आदरणीय समर साहब 'मन घिरा है वासना में,और मर्यादा में तन'--- इस मिसरे की बह्र…"
yesterday
Rakhee jain posted blog posts
yesterday

© 2022   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service