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न जाने किये कौन से रतजगे हैं /// हिंदी गजल (प्रयास जारी}

 

  मुतकारिब मुसम्मन सालिम

 122   122   122   122

 

न जाने  किये कौन से रतजगे हैं      

मुझे आप से तुम वो कहने लगे है

 

पिया है अमिय रूप वह जो तुम्हारा

पड़ा हूँ ,  सभी रोम रस में पगे हैं

 

हुआ  पाटली नैन  का जोर जादू

खड़े  इंद्र  गन्धर्व सब तो ठगे हैं

 

जिन्हें काम का देवता लोग कहते 

तुम्हे  देखकर काम उनके जगे हैं

 

हुआ है अभी  यह नया नेह बंधन

कि  लगते मुझे वे सगों से सगे हैं

 

पुछल्ले –

 

जलज यह नही, हैं विषैले विलोचन 

यही सोचकर प्रिय भ्रमर सब भगे हैं

 

चली आयी ख्वाबों में बारात उनकी

सुनो ध्यान से कितने गोले दगे हैं

 

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:45pm

आ० सौरभ जी

इतना सीखने को मिल रहा है . इतने  सिखाने वाले है . आपका स्नेह है . यह सचमुच सौभाग्य है . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:43pm

प्रिय महर्षि

मैं सीख रहा हूँ . मेरे साथ आप भी सीखो . स्नेह .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:42pm

आ० कबीर सर मेरे हिसाब से तो मिश्रा बहर में है  देखिये-

 

यही सो  च  कर  प्रिय भ्र  मर सब भ  गे हैं

1 2  2   1    2    2    1  2    2    1  2 2

पुनः  मार्ग दर्शन चाहूँगा  i सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:37pm

नजील भाई

मैं  तो अभी सीख रहा हूँ . स्नेह .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:36pm

आ० विजय सर !

धन्य हुआ .  सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:35pm

आ० अनुज

आपने एक अच्छे सलाह दी   बहर मिलाने का प्रयास नहीं दिखना चाहिए i बहुत बढ़िया i आपके सभीसुझाव उत्तम हैं . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:33pm

आ० श्याम नारायण वर्मा जी \

आपका बहुत बहुत  आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2015 at 6:32pm

आ० मिथिलेश जी

आपने  मेरी प्रथम रचना की  तक्तीअ की है यह मुझे आजीवन याद रहेगा. आपसे मार्ग दर्शन मिलता रहे . बस . सादर .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 9, 2015 at 6:07pm

आदरणीय गोपाल नारायनजी, बढिया अभ्यास चल रहा है. यह क्रम निरंतर बना रहे.
मदमाती भावनाओं से लबरेज़ इस ग़ज़ल पर खूब चर्चा हो रही है. मिसरों के गठन पर बेहतर सुझाव आ रहे हैं. यह एक शुभ संकेत है, आदरणीय. आप भाग्यशाली हैं. :-))
सादर

Comment by maharshi tripathi on April 9, 2015 at 5:11pm

आ. डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव  सर जी ,,,आप हिंदी गजल को लेकर कितने गंभीर हैं ,,,आपकी रचना में सा...

हुआ है अभी  यह नया नेह बंधन

कि  लगते मुझे वे सगों से सगे हैं

 ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,बहुत सुन्दर ,,बधाई आपको |

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