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"कहूँ कुछ और कुछ निकले जुबां से “ एक तरही ग़ज़ल ( गिरिराज भंडारी )

१२२२        १२२२      १२२ 

शिकायत हो न जाये आसमाँ से

अँधेरा अब उठा ले इस जहाँ से   

 

अगर चुप आग है, तो कह धुआँ तू  

शनासाई ये कैसी इस मकां से 

 

तेरे कूचे के पत्थर से हसद है

शिकायत क्यूँ रहे तब कहकशाँ से

 

सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ  

बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से

 

कभी थे फूल से रिश्ते मगर अब   

तगाफ़ुल से हुये हैं वे गिराँ से

 

परिंदों के परों ने की बग़ावत

सवाल अब पूछ्ना क्यूँ बागबाँ से 

 

सभी बातिल इकठ्ठे हो रहे हैं

लिये सच हम खड़े हैं नातुवाँ से

 

सियासत की बहुत मोटी है चमड़ी

रही है बेअसर आह-ओ- फुगाँ से

 

ख़ुदा के नूर से बेखुद हुआ यूँ

‘ कहूँ कुछ और निकले कुछ ज़ुबाँ से

**********************************

मौलिक एवँ अप्रकशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 10:54am

आदरणीया निध जी , सराहना के लिये आपका दिली शुक्रिया ॥

Comment by Nidhi Agrawal on March 17, 2015 at 10:42am

तेरे कूचे के पत्थर से हसद है

शिकायत क्यूँ रहे तब कहकशाँ से  - उफ़ बहुत ही सुन्दर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 10:24am

आदरणीय उमेश कटारा भाई आपका आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 10:24am

आदरनीया राजेश जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया । आपके द्वारा इंगित कमियाँ शीघ्र दूर कर लूंगा । आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 10:22am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 10:21am

आदरनीय श्याम भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया ।

Comment by umesh katara on March 16, 2015 at 9:20pm

सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ  

बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से

 वाहहहहहहहहहहहहह सर वाहहहह उम्दा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 16, 2015 at 9:12pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आ० गिरिराज जी सभी शेर शानदार हैं ,इन की मगर बात ही कुछ और है 

सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ  

बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से

 

कभी थे फूल से रिश्ते हमारे  

तगाफ़ुल से हुये हैं वे गिराँ से

 

परिंदों से परों ने की बग़ावत

सवाल अब पूछ्ना क्यूँ बागबाँ से 

 अब दो बातों पर ध्यान दिलाना चाहूंगी ---

अगर चुप आग है , पूछो धुवाँ से------धुंए  से  सही  होता है  धुवाँ  से गलत है और धुंए से काफिया नहीं बनता तो या तो शेर ख़ारिज करना पड़ेगा या कुछ और सोचना पड़ेगा 

शनासाई ये कैसी इस मकां से 

पांचवे शेर में तकाबुले रदीफ़ दोष बन रहा है 

बाकी ग़ज़ल बहुत सुन्दर है दिली बधाई लीजिये 

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:19pm

ख़ुदा के नूर से बेखुद हुआ यूँ

‘ कहूँ कुछ और निकले कुछ ज़ुबाँ से------------------वाह वाह , क्या बात है  . बहुत बढ़िया गजल  . अनुज बधाई स्वीकार करे .

Comment by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 3:42pm

Aadarniya Giriraj Bhandari Ji,

परिंदों से परों ने की बग़ावत

सवाल अब पूछ्ना क्यूँ बागबाँ से ---- Bahut Khub.... dheron...dheron badhai bahut hi sundar rachna.

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