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जो पतंगों को उड़ाता है।

जो पतंगों को उड़ाता है।
डोर खुद भी छोड़ जाता है।
जख्म सबको दिखाना मत,
हर न मरहम इस लगाता है।
पास आकर बैठ जाये जो,
क्यूँ वो आसूँ फिर छुपा ता है।
क्या हुआ देखों अँधेरे को,
बीज सपने क्यूँ चुराता है।
कलम कैसी भी रही होगी,
सोच अक्सर वो लिखाता है।
“मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 4:29pm

इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय मोहन बेगोवाल जी। कृपया आदरणीय समर कबीर सर की बात का संज्ञान ले। सादर।

Comment by Samar kabeer on January 15, 2019 at 2:30pm

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब,ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है,बह्र, शिल्प,व्याकरण पर अभी आपको क़ाबू पाना होगा,इसके लिए ओबीओ पर "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" समूह का लाभ लें ।

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