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'कौन बदल रहा है?' (लघुकथा)

देश के एक राजमार्ग पर एक ढाबे पर देर रात भोजन हेतु डेरा जमाये हुए यात्रियों में कोई किसान, मज़दूर, व्यापारी, शिक्षक आदि था, तो कोई बस या ट्रक का स्टाफ। भोजन करते हुए वे बड़े से डिजिटल टीवी पर समाचार भी सुन रहे थे।
"देखो रे! मेरा देश बदल रहा है!" एक शराबी ज़ोर से चिल्लाया।
"अबे! बदल नहीं रहा! बदला जा रहा है! पगला जा रहा है!" दूसरे साथी ने देसी दारू का घूंट गुटकने के बाद कहा।
"दरअसल देश बदल नहीं रहा; न ही बदला जा रहा है! शादी-विवाह में शिरक़त माफ़िक दुनिया के जश्न-ए-तरक़्क़ी में शिरक़त वास्ते तरक़्क़ी के चोले पहन कर ख़ुश हो रहा है; 'वेश' बदलकर ख़ुद के साथ 'छल' कर रहा है!" एक शिक्षक ने अपना मौन तोड़ते हुए कह ही दिया!
"हो सकता है कि यही सच हो! लेकिन जहां किसानों, मज़दूरों और ग़रीबों की तरक़्क़ी न हो सके, वह मुल्क न तो बदलता है; न ही वह अपने साथ छल करता है; वह तो देशी और विदेशी ताकतवरों से केवल छला जाता है! 'अंगुली' पकड़ कर अपने वतन का 'पहुंचा' पकड़ा जा रहा है, बस!" एक आधुनिक कृषक ने अपनी पीड़ा यूं शाब्दिक की।
"बिल्कुल सही बॉस! अपनी कमज़ोरियां पकड़ा रहे हैं उनको ... और उनकी कमज़ोरियां हम पकड़ रहे हैं, बस!" पहला शराबी टीवी ऑफ़ करते हुए अपने डगमगाते क़दम संभालते हुए बोला - "कुछ हम बदलें, कुछ तुम; क्या समझे! ... सुधरेंगे, तो मिट जायेंगे ग़म!"
"न सुधरेंगे और न सुधारेंगे! ...ससुरे सबके सब ... भाषण पे भाषण पिलायेंगे!" दूसरे ने देसी ठर्रे का शेष पाउच उन सब की ओर फेंकते हुए कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 23, 2018 at 3:49am

मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर समय देकर अपनी राय से वाक़िफ़ कराते हुए मेरी यूं हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब तेजवीर सिंह साहिब और जनाब मिर्ज़ा ह़ाफ़िज़ बेग साहिब।

Comment by Mirza Hafiz Baig on October 21, 2018 at 12:58pm

शहज़ाद उस्मानी साहब,

आपने सटीक वार किया। मज़दूर, किसान, गरीब, बेसहारा, बेरोज़गार, विद्यार्थी वगैरह की बात करना वैसे भी आज कल साहित्य के क्षेत्र मे दुर्लभ हो चला है। आपने बात की; यह अपने आप मे आपका बड़प्पन है। शुक्रिया और बधाई। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 19, 2018 at 12:08pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।बेहतरीन लघुकथा।

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