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कई दिनों से तलाश रहा हूँ

एक भूली हुई डायरी

कुछ कहानियाँ

जो स्मृतियों में धुंधली हो गई हैं |

कई सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद

मुड़ कर देखता हूँ

कदमों के निशान

जो ढूढें से भी नहीं मिलते हैं |

कामयाबी के बाद बाँटना चाहता हूँ

हताशा और निराशा

के वो किस्से

जो रहे हैं मेरी जिंदगी के हिस्से |

पर उसे सुनने का वक्त

किसी पे नहीं है

और ये सही है की

नाकामयाबी सिर्फ अपने हिस्से की चीज़ है |

इसलिए अपनी खोई हुई कहानियाँ

और नाकामयाबी

हर किसी को अज़ीज़ है |

खोयी कहानी का ढांचा

यूँ तो अब भी याद है

पर उसे फिर लिखने से मन कतरा रहा है

कामयाबी सिर चढ़ी है

और अतीत को झूठला रहा है |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित )

 

 

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on July 22, 2018 at 8:58pm

सोमेश जी आदाब,

            अतीत स्मृतियों की डायरी को टटोलने की तलाश करती लाजवाब रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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