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कैसे करे व्यंग रे...

बीत गई सर्दी , बीत गई ठंड रे ,

दिनभर लुआर बहे गर्मी प्रचंड रे ,

चार दिन की चाँदनी सा प्यारा बसंत था,

पसीने की बूंदों से भीगा अंग-अंग रे ,

स्वेटर,कमीज,कोट लिपटे कई असन वस्त्र,

छोड़छाड़ देह को हुए खंड-खंड रे ,

गर्मी की चुभन से हाल बेहाल हुआ ,

"अज्ञात" कैसे ! कैसे करे व्यंग रे .

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 7, 2018 at 6:28pm

वाह वाह खूब बहुतखूब लिखा...बधाई

Comment by नाथ सोनांचली on February 7, 2018 at 6:23pm

आद0 अजय जी सादर अभिवादन। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें

Comment by Samar kabeer on February 4, 2018 at 9:29pm

जनाब अजय जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on February 4, 2018 at 4:04pm

आदरणीय अजय जी आदाब,

                      अच्छा प्रयास । प्रयास जारी रखे । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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