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दूर से ढोल मजीरे की ताल पर हुरियारों की आवाज आ रही थी – ‘अवध माँ  राना भयो मरदाना कि हाँ--- हाँ -----राना भयो मरदाना ‘

हाथ में पिचकारी लिए एक युवक ने किसी वृद्ध से पूंछा – ये राना कौन है ? कौनो बड़े हुरियार थे का जो इनके नाम की होरी गाई जा रही है.’

बुजुर्ग ने आश्चर्य से युवक की और देखा और कहा –‘तुम का पढ़े हो, तुम्हे अपने बैसवारे का इतिहास भी नहीं मालूम. अरे राना यहीं शंकरपुर के ताल्लुकेदार थे, जिन्होंने सन सत्तावन की क्रान्ति में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और आखिर तक अवध की नवाबत का साथ दिया.’

‘हाँ, तो कौन बड़ी बात ,लड़े तो बहुत लोग मगर सब हारि गे ‘

‘तो का राना जीते के बदे लड़े. उन्हें का पता नाहीं था कि अंग्रेज से जीतना संभव नाही था . मुदा वे अपने आत्म सम्मान के बदे लड़े. अपने नवाब के बदे  लड़े . अपनी माटी, अपने देश के बदे लड़े ‘

‘तो इहौ कौन बड़ी बात ? बहुत जने लड़े .’

‘बड़ी बात ई कि अवध के और तमाम तालुकेदारन की तरह वी अंग्रेजन से नाही मिले . जब अवध के बड़े बड़े जमीदार अंग्रेजों के टुकड़ों के सामने घुटने टेकत  रहे,  तब राना लखनऊ में इश्तेहार देत रहे  के अंग्रेज हुशियार हो जांय क्यूंकि अब राना का प्रचंड धावा होय वाला है. बड़ी बात ई कि जब अंग्रेजन ने उनके पास सुलहनामा भेजा और उनका तालुका तक बहाल करने पर राजी हुए तब भी वी नाही माने. बड़ी बात ई कि तमाम लडाईन में अंग्रेज न उनका मार सके और न गिरफ्तार कर सके. हियाँ तक कि शंकरपुर में उनका किला घेरे के बाद भी  राना को नाही पकड पाए और वी अंग्रेजन का चकमा देकर सपरिवार सुरक्षित निकरि भागे . .  बड़ी बात ई कि वी बेगम हजरतमहल को सुरक्षित नेपाल तक पहुँचाने में कामयाब भये.’

‘यानि कि अगर राना चहिते तो अंग्रेजन से सुलह कर वी भी आराम की जिदगी बसर कर सकते थे पर उन्होंने बहती गंगा में हाथ नहीं धोया और धारा के विपरीत चलते रहे  -------‘   युवक की बात नजदीक आ चुके हुरियारों की शोर में डूब गयी . मस्त हुरियार नाच-नाच कर उच्च स्वर में गा रहे थे –

नक्की मिले, मान सिंह मिलिगे, मिले सुदर्शन काना

छत्री बंशु एक ना मिलिहै जाने सकल जहाना

अवध माँ राना भयो मरदाना   

 

(मौलिक / अप्रकाशित)

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