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'लक्ष्मी का तकनीकी सफ़र'--(लघु कथा)

"वाह, भाभी इस बार तो ग़ज़ब की जीन्स-टोप लायी हो आगरा से ....लेकिन कुछ ज़्यादा ही महंगा है.....भाई साहब को मना ही लिया आपने !"- शालू ने चहकते हुये लक्ष्मी से कहा ।
"देखो, अभी यहाँ किसी को बताना मत, वरना ख़ानदानी सड़ल्ले रीति-रिवाज़ों के भाषण अभी शुरू हो जायेंगे। जहाँ तक महंगे होने की बात है, तो सुन मैं लक्ष्मी हूँ लक्ष्मी ! मुझे 'लक्ष्मी' को टेकल करने और हैण्डल करने की टेकनीक अच्छी तरह आती है। मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ये मुझे बीमार ननंद जी को देेखने जबरन आगरा ले तो गये, लेकिन मैं धन-दौलत के मामले में किसी भी तरह 'सफर' करने वालियों में से नहीं हूँ !अरे, हम दोनों इतनी मेहनत से पैसा कमाते हैं,तो क्या इनकेभाई बहिनों और बुड्ढों-शुड्ढों पर खर्च करने के लिये ? आगरा तक के 'लम्बे सफ़र' में आने-जाने का ख़र्चा और दीगर खर्च मिला कर हमारे सात हज़ार रुपये यूँ ही ख़र्च हो गये। पूरे के पूरे मैंने नन्दोई जी से पिकनिक, मेला, शोपिंग से वसूल कर ही लिये। अरे, सीधी उंगली से घी न निकले तो टेढ़ी कर लेनी चाहिए, नहीं तो श्रवण कुमार जैसे पतिदेव ........"

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 28, 2015 at 1:28am
रचना के अवलोकन व सराहना हेतु आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 28, 2015 at 1:26am
बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 27, 2015 at 10:41pm

बहुत बढ़िया .... हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर.

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