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इखलास का ईनाम गरल कर के चल दिए

221 2121 1222 212
इखलास के ख़याल गरल कर के चल दिए।
अरमाने दिल तमाम तरल कर के चल दिए।।

शमशीरे ज़फ़ा ऐसे चली दिल के शहर पे
चुन चुन के सारे ख़ाब मसल कर के चल दिए।।

मेरी वफ़ा ए इश्क़ की कीमत तो देखिये।
चैन ओ सुकून में ही ख़लल कर के चल दिए।।

मेरे खुदा ए इश्क़ की रहमत तो देखिये।
सज़दे सलाम सारे विफल कर के चल दिए।।

अपनी भी आदतों को कहाँ हम बदल सके।
उनके करम कलम से ग़ज़ल कर के चल दिए।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 2, 2015 at 9:07am
तकाबुले रदीफन दोष नहीं समझ पा रहा
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 2, 2015 at 8:24am
आदरणीय मिथिलेश सर
सादर अभिवादन

इस ग़ज़ल में "गरल" "तरल" और उसके बाद "मसल, ख़लल,विफल और ग़ज़ल" का प्रयोग किया गया है। इस मुद्दे पर आपका सुझाव बहुत ही बढ़िया है; यदि मतले में "गरल और कँवल" किया जाये तो काफ़िया "अल" निर्धारित होगा; जो स्वीकार्य होगा; किन्तु ग़ज़ल का कथ्य बदल जायेगा।

मैं कल डॉ इक़बाल जी की एक ग़ज़ल पढ़ रहा था, जिसके कुछ अंश निम्नवत् हैं-

"फिर चिराग़े लाला से रोशन हुए कोहो दमन
मुझको फिर नग़मों पे उकसाने लगा मुरग़े चमन
फूल हैं सेहरा में या परयाँ क़तार अन्दर क़तार
ऊदे ऊदे नीले नीले पीले पीले पैरहन
बरगे गुल पर रख गई शबनम का मोती बादेसुबह
और चमकाती है इस मोती को सूरज की किरन
हुस्ने बेपरवाह को अपनी बेनक़ाबी के लिए
हों अगर शेहरों से बन प्यारे शेहर अच्छे के बन।।"(कॉपी किया गया)

उपरोक्त में-
मतले में = "दमन और चमन"
बाक शेर में= पैरहन, किरन, बन,धन आदि का प्रयोग हुआ है।

मैंने जाना कि "मतले में गरल और तरल शब्द का प्रयोग होने का बावज़ूद आगे, विफल, सफल, ग़ज़ल, फ़सल आदि का प्रयोग कर सकते हैं।।

यद्यपि;

आपके सुझावों से मैं असहमत नहीं हूँ किन्तु नई जानकारी के सन्दर्भ में इसका उल्लेख किया जाना उचित लगा।।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 20, 2015 at 10:40pm
प्रिय मनोज भाई
इस ओबीओ पेज तक मुझे पहुँचाने के लिए हृदय से आभार।
संशोधन के सुझावों को स्वीकार करने की प्रेरणा आप से ही मिली है;अन्यथा आप तो मेरी कमी से परिचित ही हैं।

प्रकृति दोष का परिमार्जन करने की प्रेरणा के लिए आभार।।
Comment by मनोज अहसास on September 20, 2015 at 10:35pm
आदरणीय पंकज भाई
आपकी ग़ज़ल यात्रा में हम आपके साथ चलने की कोशिश ज़रूर करेगे
सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 20, 2015 at 10:28pm
मनोज भाई नमस्कार निवेदित है
Comment by मनोज अहसास on September 20, 2015 at 9:28pm
बहुत आभार
आदरणिय मिथिलेश सर
आपने बहुत अच्छे तरीके से पंकज जी और हमारा मार्गदर्शन किया है
इससे बहुत सहायता मिलेगी

और पंकज भाई को ग़ज़ल की दुनिया में बहुत बड़े मुकाम मिलें शुभकामना
सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 20, 2015 at 8:18pm
आदरणीय मिथिलेश सर सादर आभार; इस मार्गदर्शन से मेरी ग़ज़ल लिखने यात्रा में सहायता मिलेगी।।

आदर अभिवादन स्वीकारें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 20, 2015 at 8:11pm

शमशीरे ज़फ़ा ऐसे चली दिल के शहर पर

ये मिसरा बेबह्र हो रहा है 

इसे यूं कर सकते है 

शमशीर चल गई है ऐसे दिल के शह्र में 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 20, 2015 at 8:07pm

आदरणीय पंकज जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई आपको बधाई 

अब बिन्दुवार बात करें -

1. बह्र- आपने बह्र 221 2121 1222 212 ली है किन्तु वास्तव में प्रचलित बह्र यह है 221 - 2121 - 1221 - 212

आपकी ग़ज़ल भी इसी बह्र पर है. आपने पूरी ग़ज़ल इसी बह्र में लिखी है बस ऊपर गलत बह्र लिखी है.

इखलास के ख़याल गरल कर के चल दिए।
अरमाने दिल तमाम तरल कर के चल दिए।।

मतला बढ़िया है बस काफिया गरल/तरल के कारण अरल निर्धारित हो रहा है जो आगे अशआर में निभाया नहीं गया है अतः मतला यूं कह सकते है- 

इखलास के ख़याल गरल कर के चल दिए।
अरमाने दिल तमाम कँवल कर के चल दिए।। अब काफिया 'अल' निर्धारित हुआ है तो मसल/खलल/विफल/गजल को सपोर्ट करता है 

इसी प्रकार रदीफ़ 'कर के चल दिए' कर के साथ के का प्रयोग अच्छा नहीं लग रहा है अतः रदीफ़ 'कर वो चल दिए' किया जा सकता है. 

शमशीरे ज़फ़ा ऐसे चली दिल के शहर पर (पे रखने से तकाबुले रदिफेन दोष आ रहा है इसलिए इसे पर कर दिया )
चुन चुन के सारे ख़ाब मसल कर के चल दिए।।

मेरी वफ़ा ए इश्क़ की कीमत तो देख लो ............ देखिये को देख लो करने से तकाबुले रदिफेन दोष समाप्त हो जाएगा 
चैन ओ सुकून में ही ख़लल कर के चल दिए।।

मेरे खुदा ए इश्क़ की रहमत तो देख लो .................... देखिये को देख लो करने से तकाबुले रदिफेन दोष समाप्त हो जाएगा 
सज़दे सलाम सारे विफल कर के चल दिए।।

अपनी भी आदतों को कहाँ हम सके बदल...... तकाबुले रदिफेन दोष हटाने के लिए किया है बाकी 'बदल सके' ज्यादा अच्छा लग रहा है 
उनके करम कलम से ग़ज़ल कर के चल दिए।।

आपको बह्र साधते देखना बहुत अच्छा लग रहा है.   सादर ..... 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 17, 2015 at 8:59am
जी मनोज भाई इसे भी जल्दी ही सुधार दूँगा।

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