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बादल जब बेज़ार किसी से क्या कहना |
फिर कैसी बौछार किसी से क्या कहना |
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ख़ामोशी, सन्नाटें किस की सुनते है |
बातें है बेकार किसी से क्या कहना |
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बूढ़े पेड़ों पर आखिर क्या गुजरी है |
पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना |
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रोते है वाइज़, रोने दो रस्मों को |
कर लो बस यलगार किसी से क्या कहना |
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अपनी छतरी लेकर निकलों राहों में |
बारिश के आसार किसी से क्या कहना |
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जैसे तैसे हम तो खुद को ढो लेंगे |
काँधें जो नाज़ार किसी से क्या कहना |
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दूरी में अब कुर्बत कैसे आएगी |
रिश्तें है बेतार किसी से क्या कहना |
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आदत अपनी जाते - जाते जाएगी |
वो भी है लाचार किसी से क्या कहना |
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महफ़िल में तनहां थे पर खामोश रहे |
कब थे हम दरकार किसी से क्या कहना |
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साहिल से ‘मिथिलेश’ न देखों लहरों को |
जीवन है मझधार किसी से क्या कहना |
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Comment
आदरणीय सर्वेश भाई जी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार..
आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी, रचना पर स्नेह, सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार, हार्दिक धन्यवाद
वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह...भाई जी बहुत सुन्दर, आनन्द गया ग़ज़ल पढ़कर, बधाई स्वीकारें
आ0 भाई मिथिलेश जी , खुबसूरत ग़ज़ल हुई है | सभी अशआर दिल को छूने वाले है |बहुत बहुत बधाई |
आदरणीय मिथिलेश जी ,शानदार रचना है .
ख़ामोशी, सन्नाटें किस की सुनते है |
बातें है बेकार किसी से क्या कहना....सुन्दर |
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बूढ़े पेड़ों पर आखिर क्या गुजरी है |
पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना....बहुत बढ़िया ,बहुत बहुत बधाई आपको ! |
आदरणीय मोहन सेठी 'इंतजार' जी
सराहना हेतु बहुत बहुत आभार जी
वाह वाह.... बहुत खूबसूरत रचना
आदरणीय अजय भाई जी आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा पढ़कर झूम जाता हूँ. इस स्नेह और सराहना के लिए दिल से आभार व्यक्त करता हूँ.
आदरणीया राजेश कुमारी जी, इस प्रयास पर आपकी सकारात्मक टिप्पणी मुग्ध कर गई. आपका स्नेह और आशीर्वाद मिल गया, सौभाग्य है. नए रचनाकार की मुक्तकंठ प्रशंसा आपके हृदय की विशालता का परिचायक है. ये शाबासी हमेशा ही अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करती है. आपने ग़ज़ल के कुछ अशआर कोट करने लायक समझे, जानकार बहुत संतोष हुआ. इस सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ. नमन
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