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नव वर्ष पर ...हों सृजन अब कुछ नये से..

नव वर्ष पर....

हों सृजन अब कुछ नये से.....
कुछ नई सी कल्पनाएं।
फिर नया यह वर्ष आओ
हम सभी मिलकर मनाएं।

छोड़ दें हम पंगु सब
परिपाटियों को।
दें नये स्वर से गुँजा
इन वादियों को।
जो सुखद सी सीख गत से
है मिली थाती हमें
साथ ले बढ़ते चले हम
तोड़ कर सब वर्जनाएं।

फिर नया यह वर्ष आओ
हम सभी मिलकर मनाएं।

मुफलिसी सीलन भरे
कोनों पसरती।
जिन्दगी भय लूट के
सायों सिसकती
घूप पर हक है सभी का
सब जियें निर्भय यहाँ
मानसों के द्वार खोलें
आ रही संभावनाएं।

फिर नया यह वर्ष आओ
हम सभी मिलकर मनाएं।
सीमा हरि शर्मा
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on December 20, 2014 at 6:27pm

मानसों के द्वार खोलें
आ रही संभावनाएं।....आदरणीया सीमा हरी शर्मा जी सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई ! सादर!

Comment by Shyam Narain Verma on December 20, 2014 at 5:17pm

बेहद उम्दा हार्दिक बधाई आपको

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