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जब आत्मग्लानि 
पार कर जाती है 
पीड़ा की पराकाष्ठा 
तब मैं हीनभावनाग्रस्त 
विचारता हूँ...
शाश्वत रुपी मौत...
मन को कई तर्कों से 
कर देता हूँ आश्वाषित 
कि जीवन की सार्थकता 
मात्र जीवंतता से ही नहीं परिभाषित 
कि हर विडंबना का अंत 
मात्र मृत्यु से ही है सम्बंधित 
कि अनंत के पार मिलूंगा तुम्हें 
कि मृत्यु उपरान्त भी 
रहूँगा तुम्हारा प्रतीक्षित...
कि अंत के उपरांत भी
रहूँगा सदा तुम्हारा ......
पर जब करना चाहता हूँ चेष्टा 
तुम स्वयं ही बन पथ प्रदेष्टा ....
दिखाती हो मार्ग ...
और पूछ लेती हो कई प्रश्न...
सदा की तरह नहीं होता कोई उत्तर 
सदा की तरह झुका लेता हूँ सर 
सदा की तरह नहीं आने देता 
आँखों में हृदय की व्यथा .....
बस सोचता हूँ कि ...
तुम कितनें कठिन प्रश्न पूछती हो 
या मुझे ही लगते है कठिन.......
और अंत में तुम्हारा कहना ...
कि ...मैं क्योँ चुनता हूँ सदा सरल पथ ......
दोनों ने प्रेम किया है ना ......
दोनों साथ - साथ जीकर देखते है 
जीवन रुपी मृत्यु ......
लेकिन सदा भूल जाती हो तुम 
तुम्हारे साथ तो मृत्यु भी है जीवन ....
तुम्हारे साथ तो मृत्यु भी है जीवन ....


.अभिवृत

मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2014 at 3:04am

संभवतः आपकी पहली रचना से गुजर रहा हूँ. आपकी अन्य रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी. आप इस मंच पर प्रस्तुत हुई रचनाओं को अवश्य पढ़ें.
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