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एक आंधी सी उठे है अन्दर 
एक बिजली सी कड़क जाती है 
एक झोंका भिगा गया तन-मन 
इस बियाबां में यूँ ही तनहा मैं
कब से रह ताक रहा हूँ उसकी...

 
वो जो बौछार से टकराते हुए 
एक छतरी का आसरा लेकर 

इक मसीहा सा बन के आता है 
मुझको भींगने से बचाता है...

हाँ...ये सच है बारहा उसने 
मेरे दुःख की घडी में मुझको 
राहतें दीं हैं....चाहतें दीं हैं....
और हर बार आदतन उसको 
सुख के लम्हों में भूल जाता हूँ 

वो मुझे दुवाओं में याद करता है 
और मैं दुःख में उसे याद करता हूँ....

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 451

Comment

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Comment by विजय मिश्र on January 30, 2014 at 12:46pm
बेहतरीन लिखा सुहैल भाई , ऊपर वाले की मेहर पर अच्छी लाइनें डालीं |बधाई
Comment by Meena Pathak on January 30, 2014 at 12:26pm

बहुत सुन्दर रचना .... बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 30, 2014 at 10:28am

आदरणीय अनवर जी वास्तविकता यही है हम ईश्वर को तभी याद करते हैं जब हम किसी संकट में होते हैं बहुत ही सुन्दरता से लिखी गई खूबसूरत प्रस्तुति .. रह को राह कर लीजिये टाइपिंग मिस्टेक हो गई है. इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें.

Comment by annapurna bajpai on January 27, 2014 at 7:31pm

सुंदर प्रस्तुति बधाई । 

Comment by Shyam Narain Verma on January 27, 2014 at 12:50pm
बहुत खूब , आपको हार्दिक बधाइयाँ .....

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