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मेरी अनकही बातों पर ऐतबार न कर.

जमाना बेताब है मुश्किलें पैदा करने को,

मेरी अनकही बातों पर ऐतबार न कर.

बढ़ते रहे दरमियाँ दिलों के बीच,

चाहत ये जमाने की कामयाब न कर.

एक लकीर है हमारे और उसके बीच,

डर है गुम  होने का, उसे पार न कर.

कल का सूरज किसने देखा है,

आ भर ले बाहों में इन्कार न कर.

यक़ीनन ढला ज़िस्म फौलाद के सांचें में,

पर दिल है शीशे का, तू वार न कर.

शक अपनों पर, परायों के खातिर,

यकीं नहीं है तो फिर प्यार न कर.

........मौलिक व अप्रकाशित..........

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Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2014 at 5:30pm

आदरणीय अनिल भाई , सुन्दर प्रयास के लिये आपको बधाई ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 24, 2014 at 5:05pm

आदरणीय अनिल जी अच्छी द्विपदी रची है आपने, ग़ज़ल में भी हाथ आजमायें ग़ज़ल पर आधारित यहीं पाठशाला में जानकारी मौजूद हैं चाहें तो लाभ उठा सकते हैं. इस प्रयास हेतु बधाई स्वीकारें.

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