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सिमरन दो साल के बेटे विभु को लेकर जब से मायके आई थी उसका मन उचाट था, गगन से जरा सी बात पर बहस ने ही उसे यंहा आने के लिए विवश किया था | यूँ गगन और उसकी 'वैवाहिक रेल' पटरी पर ठीक गति से चल रही थी पर सिमरन के नौकरी की जिद करने पर गगन ने इस रेल में इतनी जोर क़ा ब्रेक लगाया क़ि यह पटरी पर से उतर गई और सिमरन विभु को लेकर मायके आ गयी | सिमरन अपने घर से निकली तो देखा विभु उस फूल की  तरह मुरझा गया था जिसे बगिया से तोड़कर बिना पानी दिए यूँ ही फेंक दिया गया हो, कई बार सिमरन ने मोबाईल उठाकर गगन को फोन मिलाना चाहा पर नहीं मिला पाई ये सोचकर क़ि ''उसने क्यों नहीं मिलाया ?" मम्मी-पापा व छोटा भाई उसे समझाने क़ा प्रयास कर हार चुके थे | विभु ने ठीक से खाना भी नहीं खाया था बस पापा के पास ले चलो क़ि जिद लगाये बैठा था.विभु को उदास देखकर आखिर सिमरन ने मोबाईल से गगन क़ा नम्बर  मिलाया और बस इतना कहा-''तुम तो फोन करना मत,विभु क़ा भी ध्यान  नहीं तुम्हे ?'' गगन ने एक क्षण की चुप्पी के बाद कहा -''सिम्मी मैं शर्मिंदा था......मुझे शब्द नहीं मिल रहे थे...........पर तुम अपने घर क़ा गेट तो खोल दो ........मैं बाहर ही खड़ा हूँ....!'' यह सुनते ही सिमरन की आँखों  में  आंसू आ गए वो विभु को गोद में उठाकर गेट खोलने के लिए बढ़ ली, गेट खोलते ही गगन को देखकर विभु मचल उठा ........पापा.....पापा........कहता हुआ गगन की गोद में चला गया | सिमरन ने देखा की  आज उसका फूल फिर से खिल उठा था और महक भी रहा था |

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Comment by Bhasker Agrawal on January 25, 2011 at 12:56am

वाह क्या सुन्दर लघुकथा है

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 24, 2011 at 9:12am
वाह वाह , बहुत बड़ा सन्देश छुपा है इस छोटे से लघु कथा मे | सच है यदि पति पत्नी अहम् को दूर रख जरा सा समझदारी दिखाये तो प्रेम का फूल सदैव खिला रहेगा |
बहुत बहुत बधाई इस सुंदर और ससक्त लघु कथा पर |

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