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मधुमति,

मेरे पदचिन्‍हों को

पी लेता है

मेरा कल

और मेरे

प्राची पनघट पर

उग आते

निष्‍ठुर दलदल

ऐसे में किस स्‍वप्‍नत्रयी की

बात करूं मेरे मादल ?

वसुमति,

मेरे जिन रूपों को

जीता है

मेरा शतदल

उस प्रभास के

अरूण हास पर

मल जाता

कोई काजल

ऐसे में किस स्‍वप्‍नत्रयी की

बात करूं मेरे मादल ?

द्युमति,

मेरे तेज अर्क में

घुल जाता जब

मेरा छल

और वहीं कुछ

शापित बादल

नित गढ़ते

नव बड़वानल

ऐसे में किस स्‍वप्‍नत्रयी की

बात करूं मेरे मादल ?

पर दे

स्‍वर दे

धीर नेह, नय

कांत अक्ष

अब दे साजल

सित उजास दे

थिर हुलास दे

या कह दे

इतना इसपल

किस विध ऐसे दिशाकाश में

विचरूं खुलकर ओ मादल ?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on November 1, 2013 at 12:22pm

आदरणीय जितेन्‍द्र 'गीत' जी, अखिलेश जी एवं भाई केवल जी, आप सबक की स्‍नेहिल उपस्थिति के लिए हार्दिक आभार, सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 1, 2013 at 8:21am

पर दे

स्‍वर दे

धीर नेह, नय

कांत अक्ष

अब दे साजल

सित उजास दे

थिर हुलास दे

या कह दे

इतना इसपल

किस विध ऐसे दिशाकाश में

बेहद सुंदर भाव, उत्कृष्ट शब्दों से संजोये गीत पर बहुत बहुत बधाई स्वीकारें आदरणीय राजेश मृदु जी

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 31, 2013 at 10:24pm

सुंदर भाव लिए हुए गीत की बधाई राजेश मृदु भाई ।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 31, 2013 at 7:13pm

आ0 राजेश भाई जी,  वाह!  सदैव की भांति इस बार भी आपके गीत में माधुर्य शिल्प शैली और शब्द चयन आदि सब कुछ तो उत्कृष्ट है।  भावों की प्लावित दशा और अनुभवों की व्यंवहारिकता की बेजोड़ साधना ने सुन्दर सरस गीत  का रूप लिया है।  जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकारे।  सादर,

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