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मुझमें बसी मेरी कविता है तू

"रचा न जिस वास्ते तुझे खुदा ने
उस रंग में कभी खुद को न रंग
दुनियादारी है रवायत दुनिया की
दुनियादार न बन दुनिया के संग

निश्चल ये दिल है ,चंचल जैसे
छलछल कलकल बहता पानी है
थम न जाना किसी मराहिल पे
दरिया की तो रविश ही रवानी है

खिलखिलाते देखता हूँ तुझे जब भी
याद आता है मुझको अपना बचपन
क्या बख्त होगा उस घर आँगन का
तेरे क़दमों से जो हो जायेगा गुलशन

खुदा न बशर ,न हूर न फ़रिश्ता है तू
अन्तर्मन में प्रवाहित इक सरिता है तू
मन उद्गम है जिसका ,विस्तार अगम है
मेरी जाँ, मुझमें बसी मेरी कविता है तू ''

~~~ चिराग़

July 31,2013

"मौलिक व अप्रकाशित"

रवायत - रस्म
मराहिल - मुक़ाम
रविश - आचरण
रवानी - बहना
बशर - मनुष्य

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Comment by अरुन 'अनन्त' on August 2, 2013 at 2:53pm

भाई जी प्रयास बहुत ही सुन्दर है मेरी ओर से बधाई स्वीकारें. प्रयासरत रहें

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 2, 2013 at 10:36am

खुदा न बशर ,न हूर न फ़रिश्ता है तू 
अन्तर्मन में प्रवाहित इक सरिता है तू 
मन उद्गम है जिसका ,विस्तार अगम है 
मेरी जाँ, मुझमें बसी मेरी कविता है तू ''----सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई श्री केडिया चिराग जी 

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