For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

छटपटाया बहुत चाँद

-------------------------

रात बारिश बहुत जोर की थी प्रिये

देख चेहरा तेरा चाँद में खो गया

चाँद भी टिमटिमाता रहा रात भर

सौ सौ बादल उसे घेर आते रहे

फब्तियां कुछ कसे दूर से उड़ चले

कुछ चिढाये डरा जैसे छू ही लिए

लाल - भूरे कई दौड़े छू के गए

कारे - कजरारे गरजे डराते रहे

छटपटाया बहुत चाँद निकला जरा

राह थोड़ी कभी मुझसे मिलता रहा

छुप भी जाता कभी श्वेत आँचल रहा

मुझसे छुप छुप के नजरें मिलाता रहा

दूर मजबूर बंधन मै जकड़ा रहा

कल्पनाओं भरे ख्वाब खेला बढ़ा

मै चकोरा  अरे चाँद तू है मेरा

गूंगा गुड खाए मस्ती में बढ़ता रहा

बोल ना मै  सका गर्जनाएं बढीं

वर्जनाएं बढीं पग भी ठिठके रहे

छटपटाता रहा चाँद डरता रहा

लाख मिन्नत भरी राह करता रहा

काले बादल अरे ! दानवों से बढे

तम था गहराया लील चन्दा लिए

चाँद आता है क्यों चांदनी देने को ?

हो अँधेरा यहाँ रातें काली रहें

देव -मानव रहें  डर से भयभीत हो

दैत्य दानव करें राज कलयुग ही हो

चमकी आँखें मेरी कौंध बिजली पडी

चाँद मुस्काया बांछें मेरी खिल गयीं

----------------------------------------

"मौलिक व अप्रकाशित"

---------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

७. ५ ० पूर्वाह्न -८. १ ० पूर्वाह्न

१४ . ६ . २ ० १ ३

Views: 684

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:09pm

आदरणीया सावित्री राठोर जी अभिनंदन है आप का ..रचना आप के मन को छू सकी
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ लिखना सार्थक रहा ...अपना स्नेह और प्रोत्साहन यूं ही बनाये रखें
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:07pm

आदरणीय लक्ष्मण जी ...चाँद मुस्काया बांछें मेरी खिल गयीं-ये पंक्ति आप को भायी अच्छा लगा सुन के
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ लिखना सार्थक रहा ...अपना स्नेह यूं ही बनाये रखें
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:05pm

प्रिय जितेन्द्र गीत जी अभिनंदन है आप का
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ लिखना सार्थक रहा ...अपना स्नेह यूं ही बनाये रखें
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:04pm

प्रिय और आदरणीय रविकर जी
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ लिखना सार्थक रहा ...आप की वाणी में माँ सरस्वती यूं ही विराजें छंद रचनाएँ बनती जाएँ हमारी धरोहर ..सुन्दर
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:03pm

प्रिय शिरोमणि जी
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ लिखना सार्थक रहा आप की बधाई सर आँखों पर

आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:01pm

आदरणीया महिमा श्री जी अभिनन्दन है आप का बहुत दिनों बाद आप आयीं सराहना मिली हार्दिक ख़ुशी हुयी ..

लिखना सार्थक रहा

आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 9:00pm

आदरणीया गीतिका वेदिका जी अभिनन्दन है आप का ..

रचना में सुन्दर विचार और भाव आप ने देखा लिखना सार्थक रहा मित्रता यूं ही बनी रहे तो आनंद और आये रचना आप को भायी
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 8:58pm

प्रिय अनंत जी व्यस्तता से देर में मिलना होता है आप सब का स्नेह यूं ही बना रहे तो आनंद और आये रचना आप को भायी
आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ
आभार
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 8:57pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी अभिनन्दन है आप का ..आप से प्रोत्साहन मिला मन खुश हुआ
आभार
भ्रमर ५

Comment by Savitri Rathore on June 27, 2013 at 2:48pm

एक  अच्छी रचना हेतु बधाई !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Saturday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service