======ग़ज़ल=======
मौसमे गुल से अदावत सीखी
कैसे ढाना है क़यामत सीखी
हर कोई चोर नज़र में जिनकी
उनकी नज़रों से नजारत सीखी
हम गरीबों के लिए दिल दौलत
बेच के जिसको तिजारत सीखी
उसको हाथी से क्या डराते हो
जिसने चींटी से बगावत सीखी
वक़्त से तुम तो हुए संजीदा
हमने बस “दीप” शरारत सीखी
संदीप पटेल “दीप”
Comment
भाई संदीप पटेल जी बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही बधाई।
आपका हर लेखन मुझे पसंद है, आपका आभारी हूं कि अपनी रचना हमतक पहुंचाते है, सादर
उसको हाथी से क्या डराते हो
जिसने चींटी से बगावत सीखी
वाह बहुत शानदार शेर संदीप जी पूरी ग़ज़ल के भाव जिंदाबाद हैं हार्दिक बधाई आपको !!
बहुत खूब भई
आजकल बहुत अच्छा कर रहे हैं आप
ढेरों दाद क़ुबूल फरमाएँ
बस एक शिकायत है कि अब आपसे बहुत जियादा अपेक्षा रहती है उन पर खरे उतरने की भरसक कोशिश किया करें ...
// उसको हाथी से क्या डराते हो //
इस मिसरे पर नज़रे सानी फरमाएँ
आदरणीय विजय जी , आदरणीय शशि जी ........सादर प्रणाम
सराहना के लिए बहुत बहुत आभार
sundar
" हर कोई चोर नज़र में जिनकी
उनकी नज़रों से नजारत सीखी | " ----- दीपजी , सुन्दर बना है .
आदरणीय श्रीराम जी , आदरणीय ब्रिजेश नीरज जी , आदरणीय आशीष भाई जी , आदरणीय गणेश बागी सर जी, आदरणीय विन्ध्येश्वरी जी आप सभी को यथा उचित प्रणाम सहित इस उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से धन्यवाद स्नेह बनाये रखिये
//उसको हाथी से क्या डराते हो
जिसने चींटी से बगावत सीखी//
पूरी ग़ज़ल की जान है यह शेर,बहुत बढ़िया ख्याल संदीप भाई, जिंदाबाद ग़ज़ल, दाद स्वीकार करें ।
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