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एक से बढ़कर एक रहे,घोटाले इस बार,
जन जन की यही व्यथा, साँसत में सरकार ।
 
ठप्पा अब यह लग गया, घोटाला सरकार,
मत इनको हमने दिया, हम ही अब लाचार । 
 
अब घोटाला फिर बड़ा, कलसे ना मुरदार ,
कल होगा इससे बड़ा, कम की क्या दरकार ।
 
चुनाव से डरना नहीं, झेल सके तो झेल,
हार जीत होती रहे,  यह भी है एक खेल  ।
 
राजनीति तो नाम है, असल यह व्यापार,
दलित शोषित नामो से, खरीद वोट हजार ।
 
जीत गए तो मंत्री है, वर्ना अगली बार,
महाहाट में सब खड़े, बिकने को तैयार । 
 

- लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला 

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 17, 2012 at 7:23pm

रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार डॉ अजय खरे जी

Comment by Dr.Ajay Khare on December 17, 2012 at 2:50pm

adrniya Ladiwala ji system par aapne teekha prahar kiya he sahi mayne me lekhan yahi he jo kuch ujagar kare logo de dil me chub jaye badhai 

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