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आसमाँ के देखता है ख्वाब आम आदमी
चाहता है माहो-आफताब आम आदमी

खुद चुभन सहे मगर करे नहीं वो उफ़ तलक
कायनाते खार में गुलाब आम आदमी

रात दिन गुजारता है धूप छाँव भूल कर
काम कर रहा है बेहिसाब आम आदमी

वक़्त की तरह बदल बदल के गिरगिटी हुआ
बन के पल में टूटता हुबाब आम आदमी

शर्म लाज छोड़ बंदिशों की रस्म तोड़ के
हो रहा है आज कामयाब आम आदमी

हर्फ़ हर्फ़ आह से भरा पढ़ें उलट पलट
दीमकों के फेवरिट किताब आम आदमी

पर्वतों की रूह कांपने लगी है देख कर
आँख भर बहा रहा जो आब आम आदमी

जुगनुओं  से रौशनी उधार ले के कर रहा
दीपकों से तेल का हिसाब आम आदमी

मीडिया का साथ पा के हौसलों के पर लगा
ला रहा है आज इन्कलाब आम आदमी

दर्दो-गम की एक ही दवा मिली जहान में
पी रहा है "दीप" यूँ शराब आम आदमी

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 5, 2012 at 4:37pm

 आदरणीय  वीनस सर जी आदरणीय अरुण जी सादर प्रणाम
आपकी दाद पा के धन्य हुआ कुछ वक़्त की कमी से जूझ रहा हूँ
बिलम्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by वीनस केसरी on December 3, 2012 at 12:15am

सुन्दर

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on December 2, 2012 at 11:53am

संदीप भाई एक आम आदमी पर लिखी गई बेहद लाजवाब ग़ज़ल है वाह मज़ा आ गया, बधाई स्वीकारें

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2012 at 3:47pm

आदरणीया शालिनी जी , राजेश कुमारी जी , सीमा अग्रवाल जी  , आदरणीय  अशोक जी
सादर प्रणाम
आपने मेरी इस ग़ज़ल को सराहा इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ
ये स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by seema agrawal on December 1, 2012 at 12:25pm

आसमाँ के देखता है ख्वाब आम आदमी
चाहता है माहो-आफताब आम आदमी........बहुत खूब 

रात दिन गुजारता है धूप छाँव भूल कर 
काम कर रहा है बेहिसाब आम आदमी.....खास आज आम की वजह से ही खास  हैं 

बढ़िया ग़ज़ल हमेशा की तरह ..

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 1, 2012 at 9:54am

फिर से एक बेहतरीन ग़ज़ल कही है प्रिय संदीप बहुत बहुत बधाई सभी शेर बढ़िया कहे 

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 1, 2012 at 9:32am

आम आदमी कि पीडाओं पर लिखी सुन्दर गजल के लिए बधाई स्वीकारें आद. संदीप जी.

Comment by shalini kaushik on November 30, 2012 at 10:50pm

शर्म लाज छोड़ बंदिशों की रस्म तोड़ के
हो रहा है आज कामयाब आम आदमी

सही कहा आपने .

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