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सस्ता के चक्कर में !

घरनी गाड़ी में बैठाया , चली ट्रेन पकड़ी रफ्तार ।
प्लेटफार्म आस पास घर है , किसी बात की ना दरकार ।
वापस गया काम पर अपने , पहुँचेगी अकेल इस बार ।
जनरल डिब्बा भीड़ भारी, गर्मी से थे सब लाचार ।
बाहर हवा अंदर पसीना , सीट की चाहत बेकरार ।
मुंबई से इटारसी रुकी , केले वालों की भरमार ।
सस्ता खोजते चली आगे , केला मिला बहुत बेकार ।
दुःखी मन फिर गाड़ी भूली , बैठी गाड़ी में मनमार ।
झोला झाकड़ लगी खोजने , लगी पूछने हो लाचार ।
अनपढ़ को मिले तमिल यात्री , जाने कैसे बात गँवार ।
सभी खायें देख वो तरसे , पकड़े तब पेट बार बार ।
अंजान को बस कौन पूछे , आस लगा सोचे लाचार ।
मद्रास जब रुक गयी गाड़ी , उतरी झट पट हो लाचार ।
कहाँ आयी देख अंजाना , दौड़ दौड़ पूछे बार बार ।
भाषा ना जब जाने कोई , सब ही जानें पागल नारि ।
सुबह पूछते शाम हो गयी , बिकल क्षुधा हुआ बेकरार ।
तमिल साधु मिल दिया आसरा , साथ गयी मंदिर दरबार ।
लगी बनाने सब का भोजन , नौ साधु चलाते घर बार ।
साधु घुमें जा कर गलियों में, दिन भर खाना बनता झार ।
एक बोला देखो सलोनी , अब मिल चलायें संसार ।
इशारे से हाथ वो पकड़ा , युवती रोती रही अपार ।
जबरन अपना चाल चलाया , चुप मस्ती करे बार बार ।
रो रो करती रात गुजारा , साधु गाये साथ मल्हार ।
दूसरे तीसरे ने देखा , सब की नियत रही हकदार ।
बारी बारी आते सारे , बिगड़ गया उनका व्यवहार ।
कहाँ जाये छूट चंगुल से , रोती होती बस लाचार ।
रोती भाग चली मंदिर से , सूना था मंदिर घर बार ।
राह में मिली एक भिखारन , हिन्दी जानती धुवाँधार ।
तरुवर के शीतल छाया में , हाल पूछी बन समझदार ।
रोते रोते हाल सुनायी , सुन सुन व्यथा बढ़े हर बार ।
आज बारह साल गुजरा था , सुन भिखारन रोयी अपार ।
ले कर गयी साथ घर अपने , बहुत किया आदर सत्कार ।
बोली बेटी सब भूला जाओ , अब मान जा चला घर बार ।
उसको गाड़ी में बैठायी , घर को चली रो बार बार ।
सास ससुर घर से निकाले , रखने से करते इन्कार ।
रोते रोते मायके आयी , माँ बाप सुन हुए लाचार ।
पाती भेजा परदेशी को , झट पहुँचा होत बेकरार ।
घरनी रोते हाल सुनायी , मिल कर खुशी हुई बेदार ।
वापस घर लाया हिल मिल के , माँ बाप मिला के संसार ।
वर्मा सस्ता के चक्कर में , कितना दुःख मिला हर बार ।
श्याम नारायण वर्मा

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Comment

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Comment by Chandresh Kumar Chhatlani on December 1, 2012 at 8:08pm

वर्मा सस्ता के चक्कर में , कितना दुःख मिला हर बार । बहुत उम्दा || सस्ते के फेर में कितना नुकसान कर जाते हैं 

Comment by seema agrawal on December 1, 2012 at 12:31pm

बहुत बढ़िया .........श्याम जी 

पर सौरभ जी का सवाल अभी तक अनुत्तरित है//आप रचनाओं में गेयता के लिये क्या करते हैं ?//

एक विज्ञापन आता है जिसमे सहेली, सहेली से बार-बार पूछती है कि बच्चे को तीन बार दूध तो देती हो पर कैल्शियम के लिए क्या करती हो ....भाई जी विटामिन डी के बिना तो कैल्शियम कितना भी लो सब  waste हो जाता है |

Comment by shalini kaushik on November 28, 2012 at 9:43pm
shyam ji bilkul satya likh diya hai aapne..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 28, 2012 at 7:59pm

वीर छंद पर आपका प्रयास हो रहा है.

एक प्रश्न, आप रचनाओं में गेयता के लिये क्या करते हैं ? कारण कि, महज मात्रा गिन कर छंदों के चरण नहीं साध लिए जाते.

कृपया ध्यान दे...

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