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'' हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ''

हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ,
आज मुंह खोलूँगी हर गुस्ताखी माफ़ हो !

दूँगी सबूत आपको पाकीज़गी का मैं ,
पर पहले करें साबित आप पाक़-साफ़ हो !

मुझ पर लगायें बंदिशें जितनी भी आप चाहें ,
खुद पर लगाये जाने के भी ना खिलाफ हो !

मुझको सिखाना इल्म लियाकत का शबोरोज़ ,
पर पहले याद इसका खुद अलिफ़-काफ़ हो !

खुद को खुदा बनना 'नूतन' का छोड़ दो ,
जल्द दूर आपकी जाबिर ये जाफ़ हो !

                                                 शिखा कौशिक 'नूतन'

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 8, 2012 at 7:46am

प्रिय शिखा जी, हृदयवेधी भावों की सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई.

Comment by shikha kaushik on November 7, 2012 at 9:38pm
ravikar ji ,saurabh ji v rajesh ji hardik aabhar rachna ke avlokan v anmol tippani hetu

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 7, 2012 at 8:48pm

बहुत जबरदस्त भाव ह्रदय हो झंझोड़ते हुए बहुत बधाई इस प्रस्तुति के लिए शिखा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 7, 2012 at 7:07pm

प्रस्तुति की कहन एकदम से हृदय को बेध देती है. .. बधाई.

Comment by रविकर on November 7, 2012 at 5:13pm

बहुत बढ़िया आदरेया ||

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