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बहार आने पे चमन में फूल खिलते हैं 
जब तलक महक औ रंगे जवानी हो 
संग चलने दिल मिलने को मचलते हैं 
छाती है जब खिजां गुलशने ए बहारां में 
पराये तो क्या अपने भी रंग बदलते हैं 
था अकेला चला काफिला बढ़ता गया 
मकसद एक कभी जुदा जुदा 
जमाने का भी अब बदला चलन यारों 
मिल गयी उन्हें मंजिले मक़सूद 
मील के पत्थर के मानिंद मैं तनहा रह गया 

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 2:54pm

धन्यवाद आदरणीय बागी जी, सादर 

उत्साह बढ़ा , आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 21, 2012 at 2:53pm

धन्यवाद , आदरणीय रेखा जी, सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 19, 2012 at 2:47pm

//मिल गयी उन्हें मंजिले मक़सूद 
मील के पत्थर के मानिंद मैं तनहा रह गया //

अच्छी रचना, बधाई आदरणीय प्रदीप जी |

Comment by Rekha Joshi on September 19, 2012 at 10:59am

दर्द की अति सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय प्रदीप जी 

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