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छोड़ देना मत मुझे मेरे खुदा मझधार में.

सर झुकाए हूँ खडा मैं तेरे ही दरबार में.

राह में बिकते खड़े हैं मुल्क के सब रहनुमा,

रोज ही तो देखते हैं चित्र हम अखबार में.

देश की गलियाँ जनाना आबरू की कब्रगाह,

इक इशारा है बहुत क्या क्या कहें विस्तार में.

मौज में क्यूँ जी रहे हैं दुश्मने इंसानियत,

कौन दे इस प्रश्न का उत्तर भला संसार में.

अह्सने तक्वीम* के भी दाम लगते हैं यहाँ,

नामुनासिब कुछ नहीं है आज कारोबार में.

रात जैसे इक समंदर ख्वाब मेरे नाखुदा,

नाव मेरी कब रही है मेरे ही अधिकार में.

हर दफे मायूस करता आस्ताना यार का,

अब हबीब उम्मीद क्या है आस्ताना ए यार में.

__________________________________

* अह्सने तक्वीम = खुदा की सबसे कीमती रचना हमारा शरीर

___________________________________

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on August 2, 2012 at 6:58pm

सादर आभार डा बाली साहब....

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 31, 2012 at 9:24pm

संजय भाई बस इतना ही कहूँगा....बहुत उम्दा !!!

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on July 31, 2012 at 3:39pm

आदरणीय सतीश सर, आदरणीया राजेश कुमारी जी, आदरणीय संदीप भाई, आदरणीया रेखा जोशी जी, सादर आभार स्वीकारें...

Comment by Rekha Joshi on July 24, 2012 at 12:52pm

आदरणीय संजय जी 

राह में बिकते खड़े हैं मुल्क के सब रहनुमा,

रोज ही तो देखते हैं चित्र हम अखबार में..बेहद खूबसूरत गजल ,सभी शेर लाजवाब ,बधाई कबूल करें 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 24, 2012 at 10:23am

हिंदी और उर्दू दोनों को साध के लिखी अपने आप में उम्दा ग़ज़ल
सुन्दर शेर बने हैं
दाद क़ुबूल कीजिये सर जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 9:49am

अह्सने तक्वीम* के भी दाम लगते हैं यहाँ,

नामुनासिब कुछ नहीं है आज कारोबार में.

रात जैसे इक समंदर ख्वाब मेरे नाखुदा,

नाव मेरी कब रही है मेरे ही अधिकार में----------.    एक से बढ़कर एक शेर हैं ग़ज़ल में किन्तु ये दो शेर तो कमाल के हैं लाजबाब हैं बहुत बहुत बधाई संजय हबीब जी 

Comment by satish mapatpuri on July 24, 2012 at 1:05am

बहुत खूब हबीब साहेब ..... खुबसूरत ख्याल ... दाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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