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जिनके सर पर बाल नहीं है बाबाजी

सुर है लेकिन ताल नहीं है बाबाजी
पॉकेट  है पर माल नहीं है बाबाजी

क्योंकर कोई चूमे हमको सावन में
अपने चिकने गाल नहीं है बाबाजी

दर्पण से उनको नफ़रत हो जाती है
जिनके सर पर बाल नहीं है बाबाजी

मेहमानों की ख़ातिरदारी कैसे हो
घर में आटा दाल नहीं है बाबाजी

देश बेच कर खाने वाले लोगों का
लोहू शायद लाल नहीं है बाबाजी

उनकी ममता घुट घुट कर मर जाती है
जिनके अपने लाल नहीं है बाबाजी

मंहगाई के बिच्छू डंक चुभाते हैं
मोटी अपनी खाल नहीं है बाबाजी

हास्यकवि 'अलबेला' ऐसा घोड़ा है
जिसके खुर में नाल नहीं है बाबाजी

-अलबेला खत्री

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Comment

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Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 6:43pm

आपका हार्दिक हार्दिक आभार राजेश जी......
देर आयद.............
साभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 21, 2012 at 12:46pm

अरे अरे मै लेट हो गई पढने में पहले तो ग़ज़ल को हास्य रस  में लपेट  कर  जो समाज पर व्यंग्य का चांटा मारा है उसकी खूब तारीफ करने दो दूसरे तारीफ़ करनी पड़ेगी उन बारीकियों को ताड़ने वाली नजरों की ,वो कहते हैं न क्या क़यामत की नज़र रखते हैं ..आदि आदि एक अंक का बिंदु भी उनके एक्सरे में आ जाता है झट से |

Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 10:01am

आदरणीय अम्बरीश जी,
बड़ी कृपा की आपने.........धन्यवाद

मैं इसे सुधार दूंगा  और भविष्य में भी ध्यान रखूँगा . हाँ, एक निवेदन करना चाहता हूँ  कि  मुझे ग़ज़ल की जानकारी न के बराबर है. मैं तो एक लय पकड़ लेता हूँ और उसी पर लिखता रहता हूँ . इस कारण  कभी कभी  मेरे ख़ुद के दोषपूर्ण उच्चारण  से भी  मामला मीटर के बाहर हो जाता है

__जब बह्र की जानकारी  प्राप्त कर लूँगा तब  ये कमी दूर हो जायेगी, लेकिन तब तक कृपया यों ही  ध्यान देते रहिएगा

______सादर

Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 9:49am

:-)

Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 9:48am

कितना अच्छा लगेगा
जब कर विभाग वाले कहेंगे
टिप्पणी कर !
और आप को  करनी ही पड़ेगी....हा हा हा

Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 9:46am

सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 21, 2012 at 9:36am

//मेहमानों की ख़ातिरदारी कैसे हो
घर में आटा दाल नहीं है बाबाजी

मंहगाई के बिच्छू डंक चुभाते हैं
मोटी अपनी खाल नहीं है बाबाजी

हास्यकवि 'अलबेला' ऐसा घोड़ा है
जिसके खुर में नाल नहीं है बाबाजी
//

 

आदरणीय अलबेला जी, बहुत खूबसूरत गज़ल कही है आपने .....जीवन से सारे रंगों को समेटे हुए सभी अशआर एक से बढ़कर एक हैं ......इस निमित्त हमारी ओर से दिली बधाई स्वीकारें .....

निम्नलिखित मिसरे को पुनः देख लीजियेगा यह बेबह्र हो गया है |

२ /१  /२/१ / २   /२  /२  /२ /२  /२ /२   २

दे/श/ बे/च/ कर/ खा/ने/ वा/ले/ लो/गों/ का

सुझाव : बेच के स्थान पर 'लुटा', 'चबा' अथवा  जो भी आपको उपयुक्त लगे .....

उदाहरण

२ /२  /२    /२    /२  /२  /२ /२ /२ /२  /२

दे/श च/बा/ कर /खा/ने/ वा/ले/ लो/गों/ का

सादर

Comment by UMASHANKER MISHRA on July 21, 2012 at 8:24am

...प्रभु लगता है टिपण्णी पर टेक्स लगवाओगे..... ये टैक्स लगाने वाली टेक्सी सरकार देख रही है हा हा हा

जय हो जय हो

Comment by वीनस केसरी on July 21, 2012 at 3:43am

सुर है लेकिन ताल नहीं है बाबाजी
पॉकेट  है पर माल नहीं है बाबाजी

क्योंकर कोई चूमे हमको सावन में
अपने चिकने गाल नहीं है बाबाजी

वाह वाह .....

Comment by Albela Khatri on July 21, 2012 at 12:06am

आप गलत बयानी कर रहे हैं जनाब !
ओ बी ओ में ऐसा  करना सख्त मना है ....भले ही लोग मानते नहीं,  जहाँ जहाँ जो जो करना मना होता है, वहीँ जा कर वो वो कर डालते हैं . आपके भी ढंग कुछ ऐसे ही दिख रहे हैं

__आप असत्य कहते हैं कि  आपने मुफ़्त में माल पचाया है  जबकि सच ये है कि आपने दो बार पेमेंट की है

__आपकी  दो दो टिप्पणियां किसी पेमेंट से कम है क्या .....हा हा हा हा हा हा
___कहो, कैसी रही.......
___सादर

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