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ग़ज़ल- हकीक़त ज़िन्दगी की.

काँटों की रंजिश फूलों से निकाला ना कीजिये.
किसी बेगुनाह पे कीचड़ उछाला ना कीजिये.

किस्मत में लिखा अँधेरा, तो अँधेरा ही मिलेगा,
घर किसी और का जला के उज्जाला ना कीजिये.

दूसरों से मुहब्बत की, उम्मीद करना है जायज,
मगर नफरत अपने सिने में भी पाला ना कीजिये.

इंसानियत से बढ़ कर कोई भी मजहब नहीं होता,
मजहब से कभी इंसानियत को खंगाला ना कीजिये.

भूखी है सारी दुनिया प्रेम और अपनापन की,
होंठों पे मीठे बोल खातिर ताला ना कीजिये.

"नूरैन" एक हवा का झोका है सफ़र ज़िन्दगी का,
रिश्तों को अपनों और बेगानों में ढाला ना कीजिये.

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 1, 2010 at 9:38am
नुरैन भाई सर्वप्रथम तो ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार मे आपका स्वागत है, आपने बड़े ही खुबसूरत मतले से ग़ज़ल की शुरुवात की है, वाह वाह क्या अल्फाज है ...किसी बेगुनाह पे कीचड़ उछाला ना कीजिये........ यह तो पूरी मानवता की सार कह दिये, बहुत खुबसूरत,
इंसानियत से बढ़ कर कोई भी मजहब नहीं होता,
मजहब से कभी इंसानियत को खंगाला ना कीजिये.
सभी के सभी शे'र उच्चा दर्जे के हैं, बधाई कुबूल कीजिये ,

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