For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है...

आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है ।

एक ज़वा बेटे का दरया डूब जाना याद है ।


क्या सुनाए कोई नग़मा क्या पढ़ें अब हम ग़ज़ल,
ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस फसाना याद है ।

जश्ने-होली खो गई दीवाली फीक़ी पड़ गई,
अब फ़क़त हर साल इनका आना-जाना याद है ।

सोचते थे अब तलक़ वो छुप गया होगा कहीं,
लौट कर  आया नहीं उसका बहाना याद है ।

कर रहे थे बाग़बानी हम बड़े ही प्यार से,
आज भी उस ख़ुशनुमा गुल को गॅवाना याद है ।

कैसे भूलें खिरमने-दिल पर गिरी थीं बिज़लियाँ,
तिनके-तिनके से बना वो आशियाना याद है ।

जिस घ्ड़ी मैं ले चला बंटे की मय्यत दोश पर,
आँखें थीं नमदीदा फिर भी मुस्कराना याद है ।

क्या सुनाए नग़म-ए-क़ैफोतरब ‘‘अफ़सोस’’ हम,
ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस तराना याद है ।

Views: 174

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 26, 2011 at 11:57am

आदरणीय अफ़सोससाहब,  एक विभूति के अफ़सोस बन जाने की प्रक्रिया को तिल-तिल समेटना आँखों की निर्निमेष कोर को पनिया गया. घोष-स्वर में सुनना और फिर छूना...  आह ! साहब.. .!!  कुछ बीत चुके पल यों होते हैं जिनका वज़ूद पत्थर के पटल पर बनी लहरों की तरह अबूझ किन्तु कालजयी-सा होता है. हम सभी बस तमाशबीन हैं साहब, पत्थरों पर बनी उन दिल के नाज़ुक हिस्से को काढ़ लेने वाली लहर-लकीरों को जानते-बूझते हुए भी मूक बने उनमें प्रकृति की खूबसूरती निहारते हैं.

 

आपकी ऊर्जा हम सभी को उत्प्रेरित करे, अफ़सोस साहब.

संप्रेषण के साधन आपके समय से आज भले बदल गये हैं लेकिन विधा तो वही है. बस काग़ज़-कलम की जगह हाथ में की-बोर्ड आगया है भाव-शब्द उकेरने के क्रम में उंगलियों को थिरकाने को... !!  आपसे बहुत कुछ सुनना है.

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2011 at 11:19am

//आज भी बदक़िस्मती का वो ज़माना याद है ।

एक ज़वा बेटे का दरया डूब जाना याद है //

आह ! मतला दिल को चिर देने वाला है, कुछ बातें तो मरने के बाद ही भूलती हैं |


//क्या सुनाए कोई नग़मा क्या पढ़ें अब हम ग़ज़ल,
ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस फसाना याद है //

कभी कभी उन्ही फसानों से जीने का मकसद मिल जाता है, बढ़िया शे'र गाजीपुरी जी, सीधे ह्रदय को बेध रहा है | 

//जश्ने-होली खो गई दीवाली फीक़ी पड़ गई,
अब फ़क़त हर साल इनका आना-जाना याद है//

 वाजिब ही है, बगैर अपनों  के क्या होली क्या दिवाली, सब दिन एक जैसा ही है, बल्कि आम दिनों से ज्यादा वो त्यौहार के दिन सलते हैं |

//सोचते थे अब तलक़ वो छुप गया होगा कहीं,
लौट कर  आया नहीं उसका बहाना याद है //

बहुत दर्द है इस शेर में साहब |

//कर रहे थे बाग़बानी हम बड़े ही प्यार से,
आज भी उस ख़ुशनुमा गुल को गॅवाना याद है//

पुनः दर्द के ओस से भीगा एक शेर |


//कैसे भूलें खिरमने-दिल पर गिरी थीं बिज़लियाँ,
तिनके-तिनके से बना वो आशियाना याद है//

अच्छा शेर, दर्द को महसूस किया जा सकता है |

//जिस घ्ड़ी मैं ले चला बंटे की मय्यत दोश पर,
आँखें थीं नमदीदा फिर भी मुस्कराना याद है//

वोह, हे प्रभु !

//क्या सुनाए नग़म-ए-क़ैफोतरब ‘‘अफ़सोस’’ हम,
ग़म में डूबा ज़िन्दगी का बस तराना याद है//

इन तरानों के बल पर ही जीवन की नैया पार करनी है, दाद भी नहीं दे सकता इस ग़ज़ल पर,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"//आठवें शेर में पर का अर्थ दूसरों से है । // जनाब लक्ष्मण धामी भाई जी, 'पर' शब्द को…"
7 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय अबोध बालक जी, हौसला बढ़ाने के लिए आभार। "
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' नमस्कार। भाई बहुत बहुत धन्यवाद। "
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय गुरप्रीत सिंह 'जम्मू' जी आभारी हूँ। आपने सही कहा ,सर् का मार्गदर्शन मिलना हमारी…"
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। बहुत खूबसूरत आपने मतला बना दिया। सच बताऊं सर् मैंने जो सानी बदलने के…"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"धन्यवाद लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी, मेरी तरफ़ से भी आपको और सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"ओबीओ परिवार के समस्त सदस्यों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..."
Tuesday
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"गजल में आपकी सादगी का गुमां मुझको हुआ है //लम्हा लम्हा हरफ ब हरफ बानगी से जुडा हुआ है…"
Monday
Samar kabeer commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"बहुत शुक्रिय: प्रिय ।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"रूह के पार मुझको बुलाती रही' क्या कहने.. आ. भाई समर जी।"
Monday
Samar kabeer commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"भाई गुरप्रीत सिंह जी आदाब, बहुत अर्से बाद ओबीओ पर आपको देख कर ख़ुशी हुई ।"
Monday
Gurpreet Singh jammu commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"/रूह*हर दर्द अपना भुलाती रही// यूँ कहें तो:- 'रूह के पार मुझको बुलाती रही वाह वाह आदरणीय समर…"
Monday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service