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बिना दिल के ......

लहरों से टकराती
हवाओं से उलझती कश्ती को
आख़िरकार
किनारा मिल ही गया
मगर
अभी तो उसे जीना था
वो समंदर
ज़िंदा थीं जिसमें
उसकी बेशुमार ख्वाहिशें
उसके साथ जीने की
लगता था
उसके बिना
रेतीले किनारों पर
मेरा बदन मृत सा पड़ा जी रहा था
इस आस में
कि मेरा समंदर
मुझे नहीं छोड़ेगा
इन रेतीले किनारों में
दफन होने के लिए
वो जानता है
बिना दिल के भी
कहीं ज़िस्म जीता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 485

Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 13, 2020 at 8:30pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 10:06am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on September 11, 2020 at 5:25pm
आदरणीय आशीष जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है
Comment by Sushil Sarna on September 11, 2020 at 5:24pm
आदरणीय हर्ष जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार
Comment by Sushil Sarna on September 11, 2020 at 5:23pm
आदरणीय समर कबीर जी, आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है । रेतीले /रेतीली टंकण त्रुटि है अभी संशोधित कर पुन: प्रेषित कर दूंगा ।प्रथम बंशी है ।हार्दिक आभार आदरणीय
Comment by आशीष यादव on September 10, 2020 at 10:52pm

आदरणीय श्री सुशील सरना जी अच्छी रचना हुई है। बधाई स्वीकार कीजिये। 

Comment by Harash Mahajan on September 10, 2020 at 8:24pm

आदरणीय ज़नाब सरना जी बहुत ही सुंदर सृजन ।

वो जानता है
"बिना दिल के भी
कहीं ज़िस्म जीता है"

वाह ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on September 10, 2020 at 3:54pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

कुछ वाक्य विन्यास की ग़लतियाँ देखें:-

'वो समंदर 
ज़िंदा थीं जिसमें'--"वो समंदर ज़िंदा था जिसमें"

'रेतीली किनारों पर'--"रेतीले किनारों पर"

'इन रेतीली किनारों में'--"इन रेतीलेे किनारों में"

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