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गीत  (नयन झील के हंस अकेले)

सत्य कामना प्रेम साधना, प्राण हवा प्रभु को भाते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..

 

प्रिय तुम्हारे आकर्षण से,

मन-दर्पण सब शरमाते हैं

सूरज- चंदा, गगन-सितारे,

सागर-घन सब घबराते हैं.

अहं बावरे रसिक दिवाने,

मूक-पंगु बन पछताते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..1

 

देह चांदनी छुवन मर्मरी,

सहज भाव यश वंदन करती.

पथ के घुंघुरू बांध दिशाएं,

करे नृत्य रवि चंदन वरती.

धूल आंधियां तम नदानियां,

सावन तन-मन दहकाते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..2

 

पंच तत्व की ओढ़ चुनरिया,

गली-गली हर चौबारे पर,

राधा-मीरा और कबीरा,

समझाते बस पखवारे भर.

काल-झूठ अज्ञान वासना,

‘सत्यम’ से सब थर्राते हैं.

नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..3

 

केवल प्रसाद सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by मिथिलेश वामनकर on October 14, 2015 at 3:30pm

आदरणीय केवल जी बहुत सुन्दर गीत हुआ है इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई सादर 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 13, 2015 at 6:35pm
आदरणीया कांता जी, रचना पर मंतव्य देने के लिये आपका हार्दिक आभार.
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 13, 2015 at 6:33pm
आ0 श्याम नारायण भाई जी, रचना पर मंतव्य देने के लिये आपका हार्दिक आभार.
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 13, 2015 at 6:32pm
आ0 सतविंदर भाई जी, रचना पर मंतव्य देने के लिये आपका हार्दिक आभार.
Comment by kanta roy on October 12, 2015 at 10:22pm

अहं बावरे रसिक दिवाने,
मूक-पंगु बन पछताते हैं.
नयन झील के हंस अकेले, मोती सारे चुंग जाते हैं..----बड़े कोमल भाव लिए ये अनुपम रचना हुई है आदरणीय केवल प्रसाद जी। बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on October 10, 2015 at 3:38pm

सुंदर गीत के लिए तहे दिल बधाई के साथ सादर 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 10, 2015 at 10:26am
सुंदर रचना आदरणीय सत्यम जी

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