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Anwar suhail's Blog – February 2014 Archive (2)

हाशिये में प्रेम

जाने क्या सोचकर 

.......उसने भेजा 

एक गुलाब 

एक मुस्कान 

एक चितवन 

एक सरगोशी 

एक कामना 

एक आमंत्रण 



और मैंने पलटकर 

उसकी तरफ देखा भी नही 

भाग लिया 

उस तरफ 

जहां काम था 

चिंताएं थीं 

अपूर्णताये थीं 

सुविधाएं थीं 

अनुकूलताएँ थीं 

थकन और 

स्वप्न-हीन निद्रा…

Continue

Added by anwar suhail on February 13, 2014 at 8:43pm — 6 Comments

कहाँ जाएँ...

भाग कर कहाँ जाएँ
हर जगह तुम्हे पायें

जब से किया किनारा मैंने
दूरियां हैं घटती जाएँ

तुम क्या जानो कैसे-कैसे
बेढंगे से ख्वाब सताएं

गुपचुप-गुपचुप, धीरे-धीरे
माजी के लम्हात रुलाएं

चारों ओर भिखारी, डाकू
मांगें और लूट ले जाएँ

तुमसा दाता कहाँ से पायें
वापस तेरे दर पर आयें

(मौलिक अप्रकाशित)

Added by anwar suhail on February 7, 2014 at 4:04pm — 5 Comments

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