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एक राजस्थानी मुसल्सल ग़ज़ल -यादड़ल्याँ रा घोड़ां ने थे पीव लगावो एड़ |

एक राजस्थानी मुसल्सल ग़ज़ल 
***
यादड़ल्याँ रा घोड़ां ने थे पीव लगावो एड़ | 
सुपणे मांयां आय पिया जी छोड़ो म्हासूँ छेड़ | १| 
***
इंया तो म्हें गेली प्रीतड़ली में थांरी भोत 
चालूँ थांरे लारे लारे ज्यूँ सीधी सी भेड़ | २| 
***
नींदड़ली रो काम उचटणों हो ग्यो नित रो खेल 
जद जद दरवाजो रात्यां ने देवे पून भचेड़ |३ | 
***
एक महीनो के'र गया अब साल हुयग्या तीन 
गाँव उडीके,बेगा आओ , सगळा काम निवेड़ | ४ | 
***
हूक उठे जद कागलिया नित बैठे आ'र मुँडेर 
दिन में सौ सौ बारी जाऊँ निरखूँ साजण मेड़ | ५ | 
***
धान घणो चढ़ ग्यो खेताँ में रीशाँ बळता लोग 
देख धणी बिन सूनी खेती देवे ऊँट घुसेड़ | ६| 
***
कित्ता दिन धीरज रा पौधा राखूँ रोज सँभाळ 
आँधी हिवड़े में उट्ठे जद उखड़े सगळा पेड़ |७ | 
***
ई चिन्ता में बळती रेऊं कांईं हो ग्यी बात 
सौतण कोई घाल रई ना हिवड़ा माँय तरेड़ | ८ | 
***
आया क्यूँ नी जाण खबर थे समझी कोनी बात 
जेठ घरां जद पड़ी पुलिस री पिछले हफ़्ते रेड़ | ९ | 
***
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

भावार्थ 
=====
(१) यादों के घोड़ों को मेरे प्रियतम एड़ लगाइये और सपने में आकर मुझ से छेड़ मत कीजिये | 
(२) वैसे तो मैं आपके प्यार में बहुत पागल हूँ और एक सीधी भेड़ की तरह आपके पीछे पीछे चलती हूँ | 
(३)नींद उचटना तो रोज का खेल हो गया है | रात को जब जब हवा दरवाजे पर दस्तक देती है | 
(४) एक महीने का कह कर गए थे और तीन साल हो गए हैं ,पूरा गाँव आपकी प्रतीक्षा कर रहा है जल्दी आइये सारा काम समाप्त कर के | 
(५) कौआ जब मुँडेर पर आकर बैठता है तो हूक सी उठती है ,दिन में सौ सौ बार मेड़ पर जाकर देखती हूँ | 
(६) खेत में धान खूब चढ़ा हुआ है और लोग जलन के मारे और बिना मालिक के सूने खेत देखकर ऊंट घुसेड़ देते हैं | 
(७ ) धीरज के पौधों को अभी तक सम्भाल रखा है लेकिन ह्रदय में आंधी उठने पर ये पेड़ उखड़ने की संभावना है | 
(८) इस चिंता में जलती रहती हूँ कि क्या बात है आप आते क्यों नहीं ,कहीं ऐसा तो नहीं कोई सौतन हमारे दिलों के बीच दरार डाल रही हो | 
(९) एक बात समझ नहीं आई कि ये खबर जान कर भी आप क्यों नहीं आये जब जेठ जी के घर पुलिस का पिछले हफ्ते छापा पड़ा था |

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