For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मेघदूत का छायानुवाद है ‘यक्ष का संदेश’- डॉ. पाण्डेय रामेन्द्र                                   प्रस्तुति – गोपाल नारायण श्रीवास्तव    7

यक्ष का संदेश – डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

अंजुमन प्रकाशन, 942, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद-3,

प्रथम संस्करण 2018, कुल पृ0-92, मूल्य- रू. 150/-

भारतीय वाड्मय जगत प्रसिद्ध है, सर्वमान्य है। संस्कृत भाषा के प्रख्यात कवि और नाटककार महाकवि कालिदास उँगलियों पर गिने जाने वाले रचना-धर्मियों में सर्वत्र सम्मानित हैं। इसीलिए उनका भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर व्यापक प्रभाव है। हिन्दी साहित्यकारों में तुलसी, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, नागार्जुन, मोहन राकेश, उदय शंकर भट्ट तथा बालकृष्ण मिश्र, प्रभृति के काव्यों पर कहीं व्यापक तो कहीं सूक्ष्म प्रभाव सहज ही देखा जा सकता है। अत्यन्त संकोची साहित्यकार प्रसाद जी तो अपने को हिन्दी का कालिदास ही समझते थे। उनके आंसू तथा कामायनी जैसे काव्यों पर ही नहीं अपितु उनके नाटकों पर भी कालिदास का व्यापक प्रभाव बड़े ही स्पष्ट रूप में दृष्टिगोचर होता है। स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य नाटक में उनका मातृगुप्त वस्तुतः कालिदास ही है। जिसके विक्षोहपूर्ण उद्गारों में कालिदास की हार्दिक कोमलता, सुकुमारता के साथ ही साथ कोमल भावनाओं की नाटक के अन्य दृश्यों तथा संवादों में भी भरमार है। यह कहना असंगत न होगा कि स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य नाटक पर कालिदास का व्यापक प्रभाव सम्पूर्ण नाटक में विद्यमान है।

प्रसाद कृत स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य नाटक के प्रथम अंग का तृतीय दृश्य पूर्णतः कालिदासमय है। गोस्वामी तुलसीदास पर कालिदास का प्रभाव है पर अत्यन्त मर्यादित रूप में। इसी प्रकार समकालीन एवं परवर्ती कवियों यहाँ तक कि अद्यतन साहित्यकार भी इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं। मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। कालिदास प्रभावित हिन्दी के रचना-धर्मियों की इस पंगत में उदयशंकर भट्ट का कुमार सम्भव एकांकी भी आता है। इस संदर्भ में डाॅ0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव की गणना न करना बेइंसाफी होगी। उनका सद्यः प्रकाशित यक्ष का संदेश कालिदास के मेघदूत पर पूर्णतः आधारित होकर भी मेरे विचार से वह पूर्णतः अनुवाद न होकर छायानुवाद है।

यक्ष का संदेश की भूमिका में मेघदूत के अनुवादकों की गौरवशाली परम्परा पर भूमिकाकार आलोक रावत आहत लखनवी ने मेघदूत से प्रभावित कृतियों की संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित भूमिका दी है, जो नये शोध प्रबन्ध के विषयों का शीर्षक चयन करने के अच्छे संकेत देता है । (देखिये पृष्ठ 09 एवं 10) यह भूमिका किन्हीं तथाकथित प्रोफेसरों की भूमिकाओं से कहीं श्रेष्ठ एवं शोध की नयी दिशाओं की ओर स्पष्ट संकेत देने वाली है । भूमिकाकार भी अतिशय भावुक एवं विरह काव्यों से निरन्तर जुड़े रहने वाला है । आहत जी ने भूमिकाकार की अच्छी भूमिका निभायी है । इसके लिए वह बधाई के सही अर्थों में पात्र हैं । आलोक रावत जी ने यक्ष का संदेश काव्य के मर्मस्पर्शी स्थलों के उदाहरण देकर मानव मन की सुकुमार एवं मनोवैज्ञानिक उर्मियों का उत्कृष्ट परिचय दिया है ।

दूत काव्य परम्परा अति प्राचीन है। पवन को दूत बनाकर कभी प्रेमी कवि घनानन्द ने अहो बीर पौन तेरो सबै ओर गौन......हा हा तिन पायन की धूरि नेकु आनिदे प्रकृति के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण रूप को पवनदूत बनाकर भली-भांति निभाया है । रामकथा में पवनपुत्र (हनुमान) का अवदान सर्व विदित है । उनके योगदान को तुलसी के आराध्य राम ने भी स्वीकार करते हुए पवन तनय के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की है:- तुम ते तात उरिन मैं नाहीं, करि बिचार देखेउं मन माहीं ।।

‘मेघदूत’ विरह प्रधान खण्डकाव्य है । संस्कृत के नाट्य रूपों में से एक रूप भाण का है । भाण में एक ही पात्र होता है जो आकाश की ओर देखता हुआ अपने उद्गार व्यक्त करता है । कालिदास ने भाण के उसी रूप को अपनाते हुए परम्परा से प्राप्त आदि कवि वाल्मीकि कृत रामायण के प्रख्यात रामदूत हनुमान को दृष्टि में रखकर मेघदूत काव्य की रचना की है । यह अवश्य है कि प्रकृति का जैसा मनोहारी वर्णन कालिदास ने किया है वैसा न तो रामायण में है न जायसी के पद्मावत में और न ही तुलसी कृत मानस में हो पाया है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘जायसी ग्रन्थावली’ का सम्पादन करते हुए इसकी जो विस्तृत भूमिका तैयार की थी, उसमें प्राकृतिक सौन्दर्य के चित्रण की परम्परा का विशेष ध्यान रखा था । इसी क्रम में उन्होंने कहा है कि प्रकृति के जैसा सूक्ष्म और चित्राकर्षक तथा पात्र के भावानुकूल प्रकृति का मोहक वर्णन हिन्दी का लगभग कोई भी कवि नहीं कर सका है । उदाहरणार्थ उन्होंने ‘रघुवंश’ महाकाव्य के त्रयोदश सर्ग का वह अंश उद्धृत किया है जिसमें लंका विजय के उपरांत सीता और लक्ष्मण के साथ महानायक राम पुष्पक विमान से लौट रहे हैं । उस समय आकाश मार्ग से धरती के प्राकृतिक सौन्दर्य की जैसी फोटोग्राफी कवि ने की है उसकी क्षमता हिन्दी का कोई भी कवि नहीं कर सका है । इसका मूल कारण वस्तुतः परवर्ती  काल में देशाटन, पर्यटन का अभाव रहा है । इसीलिए इन कवियों के लिए ऐसा सम्भव न था ।

यक्ष का संदेश’ ‘मेघदूत का छायानुवाद है । यह ‘ककुभ‘ छंद में रचा गया है I इसके काव्यानुवाद में अनुवादक की मेहनत तो है ही  उसने पाठक के हित में बहुत सी जानकारियां भी  दी हैं, पर वे काव्यानुवाद के मध्य में आ गयी हैं जो नहीं होनी चाहिए थी, क्योंकि इससे काव्य-प्रवाह बाधित हुआ है । उचित होता कि ऐसी जानकारियां उसी पृष्ठ की यदि पाद-टिप्पणी में दी जाती, तो काव्य-सौन्दर्य कदापि बाधित न होता । लेखक ने संभवतः ऐसा न किया होगा, क्योंकि उसने शोध कार्य किया है I  अतः ऐसी सामग्री का संयोजन कहाँ और कैसे होना चाहिए इस विषय को भली-भांति समझने में वह सक्षम है । ऐसा लगता है कि प्रकाशक ने अर्थ को ध्यान में रखकर यह अनर्थ (मनमानी) किया है जो सर्वथा असंगत है ।

संस्कृत के प्रख्यात आचार्य राजशेखर ने अपने काव्यशास्त्र विषयक ग्रंथ ‘‘काव्य मीमांसा’’ में कहा है- ‘‘संयत स्वभावः कविः तदनुरूपं काव्यं।’’ अर्थात् जिस कवि का जैसा स्वभाव होता है उसी के अनुरूप वह काव्य-सर्जना करता है । इस परिप्रेक्ष्य में महाकवि कालिदास और वाणभट्ट दोनों की स्वभावगत विशेषताओं को उनके काव्यों में सहज रूप में देखा जा सकता है । कालिदास भगवान शंकर की दूसरी काशी अर्थात् उज्जयिनी (उज्जैन) में रहते हुए महाकाल के अनन्य उपासक होकर भी सुषमा और सुकुमारता के कवि थे । इसीलिए उनका भक्ति प्रधान काव्य भी श्रृंगार से अछूता नहीं रहा । इस परिप्रेक्ष्य में ‘‘कुमार सम्भव’’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है । उनकी दूसरी कालजयी कृति ‘‘मेघदूतं’’ भी इसी परम्परा का गौरव ग्रन्थ है ।

हमारे देश में दूत काव्य की परम्परा अति प्राचीन है । इसकी एक अच्छी झलक भूमिकाकार ‘‘आहत’’ ने ‘‘यक्ष का संदेश’’ में दी है। अनुवादक डॉ. श्रीवास्तव ने उससे भी बढ़कर लोक जीवन और साहित्य में प्रचलित इस परम्परा को और भी अधिक विस्तार देते हुए रामदूत हनुमान को उसी परम्परा के आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है । संस्कृत काव्य में यह परम्परा विशेष रूप से समृद्ध हुई है । जायसी कृत पद्मावत में हीरामन तोता दोनों पक्षों के लिए अच्छी भूमिका निभाता है । ‘‘मेघदूतं’’ में कुबेर की राजधानी अलकापुरी में उनका यक्ष सेवक प्रमादवश सेवा में जो त्रुटि करता है, उसके फलस्वरूप यक्षराज उसे एक वर्ष तक पत्नी से दूर जीवन व्यतीत करने का दण्ड देते हैं । परिणामतः विवश यक्ष को पत्नी से दूर रहकर रामगिरि की पहाड़ियों पर एकाकी जीवन व्यतीत करना पड़ता है । सम्पूर्ण विरह काव्य दो खण्डों में- उत्तर मेघ और पूर्व मेघ में विभक्त है । विवेच्य काव्य के प्रथम खण्ड में विरही यक्ष मेघ को दूत बनाकर उसे अपनी पत्नी के पास संदेश पहुंचाने का आग्रह करता है । साथ ही मेघ को उस तक पहुंचने में कोई कठिनाई न हो इसके लिए वह मेघ को पथ-निर्देश करता है । इस वर्णन में संस्कृत के महाकवि कालिदास द्वारा प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण और चित्रण बेजोड़ है । विवेच्य काव्य आर्यावर्त की नैसर्गिक सुषमा को विश्व के समक्ष लाने वाला है । अनुवादक डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव ने महाकवि की पात्र-परिकल्पना, कारण और उसकी सामाजिक स्थिति को लेकर जो टिप्पणियां दी हैं,  वे सार्थक एवं औचित्यपूर्ण हैं।

‘‘मेघदूत’’ काव्य का विरही नायक यक्ष को भले ही किन्हीं विद्वानों ने इन्द्र के एरावत द्वारा कुबेर के उपवन को तहस-नहस करने के कारण अथवा कुबेर को पूजा के लिए बासी (मुरझाये) फूल लाने के कारण माली यक्ष को दोषी माना हो पर हिन्दी के कवि एवं नाटककार जयशंकर प्रसाद ने यक्ष को दूसरे ही रूप में प्रस्तुत किया है । प्रसाद ने अपने समय तक उपलब्ध कालिदास से सम्बन्धित सामग्री के आधार पर अपने ऐतिहासिक नाटक ‘‘स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य’’ में इन्हें प्रेमी और प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत किया है । साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि यक्ष कश्मीर का मूल निवासी था । उसने वहीं की एक अनिन्द्य सुन्दरी से प्रेम किया था । पर जीविका के लिए उसे कश्मीर छोड़कर बाहर जाना पड़ा था । यक्ष की रूपसी प्रेयसी पर धनिकों की कुदृष्टि पड़ी । अंततः उसे वेश्यावृत्ति अपनानी पड़ी । प्रसाद की यह मान्यता मेघदूतं में वर्णित अक्षम्य अपराध के पूर्णतः अनुकूल लगती है । प्रसाद ने इस नाटक के पात्र परिचय में यह दर्शाया है कि नाटक का मातृगुप्त नामक पात्र का दूसरा नाम कालिदास है जो विक्रमादित्य के दरबार में वरिष्ठ एवं श्रेष्ठतम कवि के रूप में प्रतिष्ठित था । इसीलिए उन्होंने नाटक का नाम स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य रखा था। इधर तथाकथित विद्वानों ने उस गहराई (औचित्य) को भूलकर नाटक के नये संस्करणों का नाम (शीर्षक) ‘स्कन्दगु’ ही कर दिया है । इसमें प्रकाशक की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता बल्कि उसे ही पूर्णतः जिम्मेदार मानना समीचीन होगा ।

(मौलिक /अप्रकाशित )

Views: 933

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Anjuman Mansury 'Arzoo' posted a blog post

ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

1222 1222 1222 1222अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा…See More
10 hours ago
AMAN SINHA posted a blog post

नर हूँ ना मैं नारी हूँ

नर हूँ ना मैं नारी हूँ, लिंग भेद पर भारी हूँपर समाज का हिस्सा हूँ मैं, और जीने का अधिकारी हूँ जो है…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"मिली मुझे शुभकामना, मिले प्यार के बोलभरा हुआ हूँ स्नेह से,दिन बीता अनमोलतिथि को अति विशिष्ट बनाने…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आ. भाई सौरभ जी को जन्मदिन की ढेरों हार्दिक शुभकामनाएँ ।।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तिनका तिनका टूटा मन(गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२/२२/२२/२ सोचा था हो बच्चा मन लेकिन पाया  बूढ़ा मन।१। * नीड़  सरीखा  आँधी  में तिनका तिनका…See More
Saturday
आचार्य शीलक राम posted blog posts
Saturday
pratibha pande replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ आदरणीय सौरभ जी"
Saturday

प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"दीर्घायुरारोग्यमस्तु,सुयशः भवतु,विजयः भवतु, जन्मदिनशुभेच्छाः"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Dr.Prachi Singh replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं आदरणीय सौरभ जी "
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय. सादर"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय. जय-जय"
Saturday
Samar kabeer replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"जनाब सौरभ पाण्डेय साहिब को यौम-ए-विलादत की दिली मुबारकबाद ।"
Saturday

© 2022   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service