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ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा अंक ३८ में सम्मिलित सभी गज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)

परम आत्मीय स्वजन

सादर प्रणाम,

अढ़तीसवें तरही मुशायरे का संकलन हाज़िर हैं| दो दिनों तक चले इस आयोजन ने ओ बी ओ को कुल सत्तासी पन्नों से समृद्ध किया, कुल उनतीस गज़लें प्राप्त हुई, जिन पर आई प्रतिक्रियाओं की संख्या १०४० रही| मुशायरे की पोस्ट को अब तक ७२०० से ज्यादा बार लोड किया जा चुका है| यह आंकड़े ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे की लोकप्रियता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं| जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है| मुशायरे का यह स्तर बिना आप सबके साथ, समर्पण और संलग्नता के संभव नहीं है| मैं विशेष रूप से उन लोगों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने खुद मुशायरे में शिरकत नहीं की परन्तु अपनी सतत टिप्पणियों के माध्यम से लगातार हौसला अफजाई की|

इस बार केवल लाल रंग का ही प्रयोग कर रहा हूँ| मुशायरे के दौरान हमारे वरिष्ठ सदस्य गलतियों की तरफ पहले ही इशारा कर चुके हैं| फिर भी यदि कोई शायर अपनी ग़ज़ल पर रहनुमाई चाहता हो तो यहाँ पूछ सकता है |

मिसरा-ए-तरह...

"क्या बने बात जहां बात बनाये न बने"

क्या/2/ब/1/ने/2/बा/2     त/1/ज/1/हाँ/2/बा/2    त/1/ब/1/ना/2/ये/2   न/1/ब/1/ने/2

2122     1122      1122       112 

फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फइलुन

(बह्र: रमल मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ )

रदीफ़ :- न बने   
काफिया :-  आये (निभाये, हंसाये, जाये, सताये आदि)
विशेष: इस बह्र में पहले रुक्न २१२२ को ११२२ और अंतिम रुक्न ११२ को २२ करने की छूट है|

Saurabh Pandey

बेसुरे शोर में तूती से जो गाये न बने
पर वही गीत चढ़े सुर तो दबाये न बने

तेरी ज़िद चाँद पे क़ायम तो मैं सूरज पे फ़िदा
"क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"

जितना पढ़ता हूँ तुझे, नज़्म हुआ जाता हूँ
तू तरन्नुम ही रहे, हर्फ़ के साये न बने

फिर से उम्मीद घटाओं ने जगायी है उधर
बूँद उलझन में इधर.. प्यास बुझाये न बने

एक तितली है, मेरे साथ जिया चाहे है
पर, लगी कैक्टसी बाड़ गिराये न बने

यक-ब-यक पास तुम्हें देख सही चौंक गया
तुम अचानक जो मिले, आँख चुराये न बने

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Mohd Nayab 

जब से रूठा है मेरा यार मनाये न बने
सामने उसके कभी अश्क बहाये न बने

इश्क का रोग है ऐसा की बताये न बने
ज़ख्म दिल में है किसी को भी दिखाये न बने

हमको जिनसे थी ज़माने में वफ़ा की उम्मीद
गर्दिशों में वो हमारे लिए साये न बने

वो हमें भूल भी जाएँ तो कोई बात नहीं
हम उन्हें दिल से भुलायें तो भुलाये न बने

झूठ थी बात जो बिगड़ी तो बिगड़ती ही गयी
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने

जब से उलझी है ग़म-ए-इश्क में दुनिया मेरी
उनकी यादों को कभी दिल से भुलाये न बने

हमने चाहा कि बता दें उन्हें राज़-ए-उल्फत
हाँ मगर बात कोई होठ पे लाये न बने

ऐसा मिसरा है दिया आप ने अल्लह तौबा
खौफ ग़ालिब है कोई शेर बनाये न बने

ज़ख्म-ए-दिल उनको दिखाएं भी तो कैसे 'नायाब'
अश्क आँखों में छुपाये तो छुपाये न बने

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Tilak Raj Kapoor

राज़ की बात अगर तुमसे छुपाये न बने
क्‍या करें हम भी अगर हम से बताये न बने।

कोशिशें हार चुकें, तब ये समझ बनती है
क्‍या बने बात जहां बात बनाये न बने।

शह्र दो वक्‍त मेरा पेट तो भर देता है
भूख रिश्‍तों की किसी तौर मिटाये न बने।

वक्‍त के साथ चलूँ चाह मुझे थी लेकिन
इस कदर जड़ से बँधा हूँ कि छुड़ाये न बने।

आज गुलशन में थिरकती न दिखी वो तितली
क्‍या भला उसको हुआ, मुझसे सुनाये न बने।

अब तो अहसास की हर हद से गुजर जाये दिल
और उस पार कशिश हो कि फिर आये न बने।

चार उल्लू न हुए, जुड़ गयी संसद पूरी
प्रश्न बूझे हैं जो संसद से बुझाये न बने।

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ASHFAQ ALI (Gulshan khairabadi)

आज गुलशन मे कोई फूल खिलाए न बने
खार कितने हैं मेरे दोस्त बताए न बने

याद आए न बने उनको भुलाये न बने
जब से बिगड़ी है मेरी बात बनाए न बने

ज़िंदगी में ही मेरे दोस्त जो साये न बने
मर गये उनसे मेरा बोझ उठाए न बने

आज की रात मुझे नींद कहाँ आएगी
वस्ल के दिन की कोई बात भुलाए न बने

तेरी महफ़िल में भला आएँ तो आएँ कैसे
दर्द इतना है मेरे पाँव उठाए न बने

उसने उमीद-ए-वफ़ा कैसे करें हम आख़िर
जिनसे दो फूल लहद पर भी चढ़ाए न बने


आज के दौर मे है किससे वफ़ा की उम्मीद
नेकियाँ कर के तो दरिया मे बहाए न बने

हम से शिक़वा न हुआ उनसे शिक़ायत न हुई
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने

आज के दौर मे महंगाई है तौबा 'गुलशन'
ऐसी ग़ुरबत है कि बच्चो को पढ़ाए न बने

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sanju singh

जो हुई उनसे मुलाकात,बताये न बने
क्या कहूँ यार मगर राज़ छिपाये न बने

प्यार को यार कई बार मनाया लेकिन
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

रात बरसात में जो आग लगी सीने में
यूँ लगी आग कि ये आग बुझाये न बने

वो सियासत न करें हम पे कहाँ मुमकिन है
हम भी इक वार करें उनसे बचाये न बने

अबके बरसात पहाड़ों पे हुई ज्यादा ही
जो हुआ हाल कि वो हाल बताए न बने

वक़्त बेवक्त तेरी याद चली आती है
जो गया तू तो कभी भूल के आये न बने

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

वो है मगरूर किसी तर्ह निभाये न बने
हाथ उसका बड़ा नाज़ुक है छुड़ाये न बने

चोट दिल की है, मुई पीर दबाये न बने
वो न रुसवा हों कहीं घाव दिखाये न बने

चीज अनमोल है, तिसपर है नज़र में सबकी
दिल चुराये न बने, दाम चुकाये न बने

ये वो सूरज ही नहीं है जिसे पूजा हमने
धूप निकली है मगर देखिए साये न बने

खत्म होने को है अब तेल, अँधेरा है घना
लौ बढ़ाये न बने दीप बुझाये न बने

नाम है पाक मगर कर्म हैं नापाक तो फिर
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

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amit kumar dubey ansh

दूर जाना था मगर साथ छुड़ाये न बने
और जो साथ हैं तो प्यार निभाये न बने

लाख कोशिश थी मेरी उनको मना लूँ लेकिन
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

दिल अभी देख मुझे जाँ से गुज़र जाने दे
इश्क गर हद से गुज़र जाय छिपाये न बने

इश्क की राह में इक मोड़ रहा ऐसा भी
अजनबी बन तो गये हांथ छुड़ाये न बने

कोई मौका न मिला प्यार को आराइश का
दिल की हर बात रहे दिल में जताये न बने

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MOHD. RIZWAN

किस क़दर ज़ख्म हैं दिल में ये दिखाये न बने
दास्ताँ ग़म की मेरे दोस्त सुनाये न बने ........

सामने आ गये सज-धज के सनम मेरे तो
उनके चेहरे से नज़र अपनी हटाये न बने....

हो गया इश्क़ अयाँ अपना ज़माने में तो क्या ?
तेरी तस्वीर को आँखों में छुपाये न बने ..........

ज़ख़्म सीने में जो मुद्दत से लिए बैठा हूँ
उनकी यादों के निशाँ दिल से मिटाये न बने....

हमसे रखते हैं जो दिल में वो अदावत हर दम
"क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने "........

उनकी गलियों से गुज़रता है जनाज़ा मेरा...
उनसे दो अश्क़ मेरे गम में गिराये न बने.....

दिल ने चाहा तो बहुत उनकी मिटा दें यादें
ख़त जो महफूज़ हैं बरसों से जलाये न बने....

माँ के क़दमों मे है जन्नत ये खबर है सबको....
फिर भी दो घूँट तो पानी के पिलाये ना बने.....

आज तक लड़ता रहा जिनके लिए मैं "रिज़वान"
मुफलिसी में वो मेरे आज भी साये न बने.....

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arun kumar nigam

बाँसुरी श्याम की होठों से लगाये न बने
है ये सौतन की तरह साथ निभाये न बने ||

वृंदावन झूम रहा झूम रही हैं गलियाँ
रूप कान्हा का मधुर नैन समाये न बने ||

रासलीला के लिये कुंज चलो कान्हा जी
राधिका रूठ गई हमसे मनाये न बने ||

दूध माखन के सिवा और चुराया क्या है
भोलापन देख हँसी आज दबाये न बने ||

माँ यशोदा न सुने आज सफाई कोई
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने ||

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वीनस केसरी

वस्ल का जिक्र किसी तरह चलाये न बने
हमको पूछे न बने उनको बताये न बने

वो मेरी ज़ात में इस तरह हुआ पोशीदा
खुद को मैं जोड़ूँ तो अब उसको घटाये न बने

दिले मुश्ताक उसी ओर खिंचा जाता है
और इस जुर्म से अब खुद को बचाये न बने

न शिकायत न अदावत न हिकारत न गिला
फिर भी चुप्पी की ये दीवार गिराये न बने


बात बन जाए यहाँ तो भी क़यामत समझो
"क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"

अब तो माशूक ही हम पर ये करम करते हैं
हम हैं जिस हाल, रकीबों से सताये न बने

आजकल खुद से तकल्लुफ जो निभाता हूँ मैं
ये न हो रूठने पर खुद को मनाये न बने

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फरमूद इलाहाबादी

दाल तुमने जो पकाई है वो खाए न बने
सख्त हैं रोटियां इतनी कि चबाए न बने

अपने घर वालों के खातिर तो हो मुर्गा मछली
मेरे घर वाले गर आ जाएँ तो चाए न बने

शौके दीदार में ये हाल हुआ है यारों
जख्म कैसे हैं कहाँ पर हैं दिखाए न बने

बात करता हूँ मैं उर्दू में वो अंग्रेजी में
उनसे आदाब तो मुझसे हेलो हाए न बने

वक्ते रुखसत पे तो कहता हूँ खुदा हाफ़िज़ ही
मुझसे टाटा हो के सी यू हो के बाए न बने

किसके क्या नाम हैं ये खुद भी उसे याद नहीं
इतने पैदा किये बच्चे कि गिनाए न बने

तंदरुस्ती भी कुछ ऐसी है कि माशाअल्लाह
कस के बाहों में जकड ले तो छुडाए न बने

शायरे तंज़ ओ ज़फारत हूँ कोई भांड नहीं
मुझसे फरमूद लतीफा तो सुनाये न बने

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गीतिका 'वेदिका'

सरनगू हम खड़े, सर को तो उठाये न बने
जिनसे उम्मीद रही, वो मेरे साये न बने |

तख्लिये में लिखा वह नाम न रुसवा हो कहीं
खूब टूटा किये पर अश्क बहाये न बने |

बात इतनी सी है बिन तेरे न जी पाएंगे
तुझसे जाने न बने, हम से जताये न बने |

बात बन बन के हमेशा ही बिगड़ जाती हो
क्या बने बात, जहाँ बात बनाये न बने |

हो गये ख्वाब मेरे टूट के रेजां रेजां
हसरते दिल हाय फिर से तो सजाये न बने |

एक वो हैं जो हमें हंसने नहीं देते हैं
और हमसे कभी उनको तो रुलाये न बने |

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vandana

नूर ऐसा कि ये जज्बात छिपाये न बने
आग उल्फ़त की है दामन को बचाये न बने

इस कदर भींत उठी गर्व की चुपके चुपके
अब तो ये हाल कि दीवार गिराये न बने

फेरकर बैठ गए पीठ ख़ुशी रूठ गयी
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

तोड़ डाले हैं अगर बाँध नदी ने दुःख में
प्रश्न फिर उसकी बगावत पे उठाये न बने

आज इस दौर में जज्बात कहाँ ढूंढ रहे
इश्तिहारों से पता लाख लगाये न बने

खो गये शख्स कई उम्र बिताकर ऐसे
बेरुखी सिर पे नई नस्ल की चढ़ाये न बने

तिफ़्ल समझो न खुदाया कि उड़ाने हैं गज़ब
सिर्फ पानी में ही अब चाँद दिखाये न बने

राख के ढेर छुपी हो कोई चिंगारी भी
उफ़ हवा दे न सके और बुझाये न बने

देहरी आज नया दीप जलाकर रख दो
काँपती लौ के चिरागों को जलाए न बने

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Shijju Shakoor 

हसरतों को किसी सूरत में दबाये न बने
ख़्वाब आँखों मे उतर आये छुपाये न बने

लिख फसाना-ए-ग़मे-इश्क मेरे दिल ऐसे कि
न मिटे और किसी से ये मिटाये न बने

ये गवारा न हुआ देख ही ले मेरी तरफ
बोझ उनसे कि यूँ पलकों के उठाये न बने

सोचता हूँ कि न आऊँ तेरी महफिल में फिर
ये तकाज़ा है मुहब्बत का बिन आये न बने

और तू पूछ ले मुझसे जो सबब आने का
क्या बताऊँ मैं कि अब तो ये बताये न बने

मेरी बातों से बने बात कुछ ऐसा हो काश
‘’क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने’’

अब हवा दे तू मेरे आतिशे-जज़्बात को यूँ
गर भड़क जाये कहीं तो ये बुझाये न बने

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Kewal Prasad

कान्ह की जन्म घड़ी आज भुलाये न बने।
नागफन छत्र बना कर्म सराहे न बने।।

नन्द के गांव हुआ जश्न, बधाई गायें।
नाचते प्रेम से सब जोश दिलाये न बने।।1

अष्टमी रात बड़ी आश भरी होती है।
अब यहां देव चमत्कार बताये न बने।।2

जन्म मथुरा में हुआ, नन्द के घर आ पहुंचे।
गोप-गइया से मिले प्यार संभाले न बने।।3

कृष्ण के साथ रहें गोप-ग्वालिन-गइया।
गांव गोकुल से सुहाना ये बसाये न बने।।4

काम है आज यहां सबसे कठिन धर्म धरें।
जान मुश्किल में बड़ी सत्य बचाये न बने।।5

राह में रोक लिया हाथ छुड़ाये कैसे?
गागरी टूट गिरी शोर मचाये न बने।।6

गोपियां चींख रहीं कृष्ण चुराये माखन।
डोर में बांध लिया डांट पिलाये न बने।।7

जब यशोदा से कहा चोर-छिछोरा कान्हा।
फूट कर रोई बहुत दण्ड चलाये न बने।।8

सांझ को गोप बड़े यत्न से घुसते घर में।
रात में दूध-दही-छाछ चुराये न बने।।9

प्रेम में झूम उठे रास रचाते मोहन।
गोपियां नाच रहीं लाज लजाये न बने।।10

धर्म की बात करें धर्म बतायें कैसे?
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने।।11

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rajesh kumari

राज की बात छुपी हाय बताये न बने
सांस में फांस चुभी है कि छुपाये न बने

चाहती आज अभी साफ़ सुना दूं जाकर
हो सके होंठ हिले और सुनाये न बने

उस तरफ दर्द का सैलाब नजर आता है
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने

चैन पाऊं ये बता आज खुदा मैं कैसे
कि रुलाये न बने और हँसाये न बने

काश वो काम से ही आज इधर आ जाए
कि टलाये न टले और बिन आये न बने

रूह में कब से दबी प्यार कि वो चिंगारी
कि जलाए न जले और बुझाये न बने

ऐ खुदा आज सफीने को सहारा देना
धुंध में राह छुपी है कि चलाये न बने

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Ajay Kumar

रूठ जाऊं मैं अगर, उनसे मनाये न बने
कितना मासूम है दिलवर कि सताये न बने

चाहता हूँ कि कोई खास कहानी लिख दूँ
पर जो अहसास है दिल में वो जताये न बने

मंत्रियों को तो सियासत में गिरा देखा है
अबके रुपया भी गिरा इतना उठाये न बने

रात दिन सोचते हैं और यही कहते हैं
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

है ये सरकार महाभ्रष्ट मगर बहुमत है
हम अगर चाह भी ले तो ये गिराये न बने

साढ़े साती भी शनी की तो चली जाती है
पर ये मंहगाई है जो हम से भगाये न बने

भाव इतना भी बढेगा ये कहाँ जाना था
प्याज मंहगी हुई है इतनी कि खाये न बने

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Dinesh Kumar khurshid

क्या कहूँ कैसी है बरसात बताये न बने
बिन तेरे भीगी हुई रात बिताये न बने

हम से सुनते न बने उनसे सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बनाये न बने

ज़ुल्म करते है जो हर रोज़ मेरी ग़ुरबत पर
उनसे अब हाथ मोहब्बत का मिलाये न बने

वो ज़िन्हे देख के आईने सवंर जाते है
ऐसे चेहरों को किसी तौर रुलाये न बने

दरमियां भाई के भाई भी तो दीवार बना
क्या हुई सूरते हालात बताये न बने

कैसे कैसे है सितम अपनो के मुझ पर या रब
दिल मे जो ज़ख़्म है गैरों को दिखाये न बने

वाह रे वक्त भी क्या फेर बदल करता है
यानी रोये न बने दिल को हंसाये न बने

मुद्दते हो गयी तपते हुए "खुर्शीद" मुझे
अब गरां बोझ है मुझसे ये उठाये न बने

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Sarita Bhatia

आदमी मौन हुआ राज छुपाये न बने
चीख आकाश उठा आज सुनाये न बने|

हमसे नफ़रत न हुई उनसे मुहब्बत न हुई
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने |

यार है यार बना साथ मुलाकात रहे
कब रहे यार अगर साथ निभाए न बने |

रोज हो जीत अगर बैठ खिलाडी न रुके
बीच जब बैठ उठे हार रुकाये न बने |

ज्ञान को बाँट अगर चाह तुझे बढने की
जो रखे पास हुनर ज्ञान बढाये न बने |

क्या पता वोह कभी थाम सके बाहों में
इसलिए साथ चले हाथ हटाए न बने |

शाम जो आँख मिली हाल बताया उनको
आँख जो आज उठी हाल सुनाये न बने |

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कल्पना रामानी

फूल मुरझाए हुए, बाद सजाए न बने।
बाग उजड़ा, जो कि इक बार, बसाए न बने।

है गिला ये कि हमें, दर्द भी अपनों से मिला।
वो दिये दाग, निशानात छुड़ाए न बने।

दिल पे रखते, न अगर बात, न बनती दूरी।
दूर इक बार, हुए पास बुलाए न बने।

छोड़ ही देते जहाँ भी, ये जो कहते दिलबर।
तोड़ दी प्रीत, तो फिर रीत निभाए न बने।

अर्श को फर्श दिखाना, है ज़माने का चलन।
हो जहाँ खार, वहाँ प्यार दिखाए न बने।

जग हो बैरी भी तो क्या, मीत बनाएँ रब को।
रब से जो दूर हुए, शीश झुकाए न बने।

‘कल्पना’शूल ही रहते हों ज़ुबाँ पर जिनकी।
क्या बने बात, जहाँ बात बनाए न बने।

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मोहन बेगोवाल

साथ उनके अभी रिश्ता भी निभाये न बने
दिल ने जिसको था कहा अपना मिटाये न बने

टूट जाता हे अगर घर तो ये इलजाम क्यूँ
दौर इस में यहाँ रिश्तों को बचाये न बने

याद उनकी न रही जो रहे अपने थे कभी
अब कोई और उसे याद दिलाये न बने

पूछता हे केसे केसे सवाल अभी से हमें
जिन का कोई भी जवाब यूँ बनाये न बने

वो ख्यालों में हमारे यूँ रहे आ के मगर
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

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HAFIZ MASOOD MAHMUDABADI

जो गुज़रती है मेरे दिल मैं छुपाये न बने

दास्ताँ गम की ज़माने को सुनाये न बने

ढूढ़ना पड़ता है ग़ैरों का सहारा आखिर
बार जब अपना कभी खुद से उठाये न बने

तर बतर अश्को ने कर डाला हमारा दामन
फिर भी अह्सासे मोहब्बत है भुलाये न बने

लाख पहरा नहीं राहों में किसी की लेकिन
सूए मंजिल भी कोई जाये तो जाये न बने

उसकी महफ़िल मैं है दुश्मन का भी आना जाना
ये अगर कह दे तो फिर उसको मनाये न बने

इतनी आसां भी नहीं है ये है ग़ालिब की ज़मी
शेर तो दूर है अंदाज़ भी लाये न बने

जुस्तजू लाख करें उनकी व लेकिन "मसुउद"
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

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Albela Khatri

प्याज़ मांगो न अतिथि प्याज़ खिलाये न बने
दूर खाना व खिलाना कि दिखाये न बने

कोढ़ में खाज मिलादी मन के मोहन ने
देश की वाट लगादी कि बचाये न बने

दर्द क्या खाक मिटे चारागर ही न मिला
"क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"

जैम माँगा न मिला,बालक को मम्मी से
बाप के हाथ लगा जाम छुड़ाये न बने

हाय क्या हाल बतायें लब खामोश खड़े
गीत में दर्द भरा है जो सुनाये न बने

रंज मत कर 'अलबेला' गर कमज़ोर कहे
शेर हैं चीज निराली, हथियाये न बने

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Atendra Kumar Singh "Ravi"

क्या कहें अब कहानी आज सुनाये न बने
प्यार धोखा है यहाँ बात बताये न बने

दौर वो दूसरा था प्यार किये जो धरा पर
आज दिल में है बगावत जो दिखाये न बने

थाम कर हाथ तेरा संग किये थे गुजारा
वो बहारें वो नज़ारें तो भुलाये न बने

हम मनाते रहे तो उनको भुलाने की है जिद
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने

चाहकर भी न भुला पाता है दिल ये हमारा
दासताने जफ़ा की अब तो सुनाये न बने

रो रही है ये जमीं यूँ रो रहा है आसमाँ
दर्द इतना है बिछड़के जो दबाये न बने

दिल जलाकर के किया है रोशनीं उनके लिये
कब्र पे यूँ आज 'रवि' दीप जलाये न बने

 

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अरुन शर्मा 'अनन्त'

गम छुपाये न बने जख्म दिखाये न बने,
आह जब पीर बढ़े वक़्त बिताये न बने,

रेशमी जुल्फ घनी, नैन भरे काली घटा,
संगमरमर सा बदन हाय भुलाये न बने,

शबनमी होंठ गुलाबों से अधिक कोमल हैं,
सेतु तारीफ का मुश्किल है बनाये न बने,

रातरानी सी है मुस्कान खिली होंठों पर,
हुस्न कातिल ये तेरा जान बचाये न बने

मौत जिद पे है अड़ी साथ लेके जाने को,
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने...

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Dr Ashutosh Mishra

जख्म जो दिल में हमारे हैं दिखाये न बने
बात पर दिल की मेरे यार छुपाये न बने

याद तो उसकी दफ़न कर ली थी दिल में हमने
ख़त मगर उसके कभी हमसे जलाये न बने

देख कर रेत पे हर बार घरोंदा कोई
याद बचपन की जो आये तो भुलाये न बने

उनके लव पे है जिकर जब से मेरे दुश्मन का
उनके जूडे में ये गुल हमसे लगाए न बने

इक दफा टूट गया दिल से जो रिश्ता दिल का
लाख चाहो भी मगर रिश्ता निभाये न बने

बन के धड़कन मेरे इस दिल में धडकता है खुदा
बुत ए पत्थर पे कभी फूल चढ़ाये न बने

आशु लौटे हैं तेरे कूचे से रुसवा होकर
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

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Anurag Singh "rishi"

क्यों भला याद तेरी मुझसे भुलाये न बने
जख्म छिपता भी नही और दिखाए न बने

बुझ गया दिल जो अभी तक था दिए के जैसा
अब कोई और चरागाँ भी जलाए न बने

मेरे वजूद पे काबिज वो इस कदर देखो
ख्वाब आँखों पे कोई और सजाये न बने

वो ऐसी उलझने देता रहा सदा मुझको
न पास चैन है और दूर भी जाये न बने

वो छोटी गलतियों से बात बिगड़ती ही गयी
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

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बृजेश नीरज

पेट खाली हैं मगर भूख जताये न बने
पीर बढ़ती ही रहे पर वो सुनाये न बने

ढूंढते हैं कि किरन इक तो नजर आए कोई
रात गहरी हो गई अब ये बिताये न बने

दर्द जितना भी हो पर आँख छलकती ही नहीं
देह पर घाव जो गहरे वो छिपाये न बने

छाँव में जिसकी कटी गर्म दुपहरी थी मेरी
पेड़ की छाँव सुखद मुझसे भुलाये न बने

बात कुछ भी न थी पर बात बिगड़ती ही गयी
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने

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Ajeet Sharma 'Aakash'

अब किसी हाल में दुनिया से निभाये न बने .
बोझ ऐसा है जो कांधों पे उठाये न बने .

हमने पहले भी कई बार मनाया है उन्हें
अब के रूठे हैं सनम यूं कि मनाये न बने.

अब तो लगता है कि छाये हैं दिलो-जान पे वो
उनकी तस्वीर किसी तौर हटाये न बने.

उनको मालूम नहीं रस्मे-वफ़ा चीज़ है क्या
फिर भी तो उनको निगाहों से गिराये न बने .

पूछ्ते हैं वो तो हम से कहो कैसी गुजरी
जाने क्यों ज़ख़्मे-जिगर उनको दिखाये न बने .

अब तसल्ली दिले-नादां को मिले या न मिले
उनके कूचे में हरेक रोज़ तो जाये न बने .

लाख कोशिश की सुलझ जायें मसाइल अपने
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने .

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गज़लें मुशायरे में जिस क्रम में आई हैं उन्हें उसी क्रम में स्थान दिया गया है| किसी शायर की ग़ज़ल छूट गई हो अथवा कहीं मिसरों को चिन्हित करने में गलती हुई हो तो अविलम्ब सूचित करें|

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आदरणीया वन्दना जी जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि मिसरों को लाल रंग के अतिरिक्त किसी और प्रकार से चिन्हित नहीं किया है| फिर भी आपने अपनी ग़ज़ल में ताकाबुले रदीफ़ ऐब ढूंढ कर इसे दुरुस्त किया इसके लिए आपको साधुवाद|

 बहुत बहुत आभार आदरणीय आपने दुबारा समय दिया और उत्साहवर्धन किया  

ओ बी ओ तरही मुशायरा अंक -38 वां आयोजन सफल और कामयाब रहा यह हार्दिक प्रसन्नता की बात है, सभी गज़लें एक साथ उनके चिन्हित मिसरों के साथ प्रस्तुत करने हेतु आदरणीय राणा सर जी हार्दिक आभार आपका.

आदरनीय राणा जी ,

आप जी को तकतीई कर के भेज , कृपा मेरा मेरा मार्गदर्शन कीजिए 

 2   1   2   2 /  1    1    2  2 /  1 1   2 2 / 1 1 2 

सा थ  उन के /  अ  भी  रिश्ता /  भी निभाये /न बने
दिल ने जिसको /था कहा अप  /ना मिटाये    /न बने

टू  ट जा  ता /हे अ गर घर/   तो ये इलजा/   म क्यूँ
दौ र  इस में/ यहाँ रिश्तों  /   को बचाये    /   न बने

या द   उनकी    / न रही जो  / रहे अपने  / थे कभी
अब  को ई औ  /र उसे या     /द दिलाये     /न बने

पू  छ  ता  हे  /केसे केसे   /सवाल अभी   /से हमें
जिन  का  कोई /भी जवाब-----  /यूँ बनाये / न बने(अभी)

वो     ख्यालों    /में हमारे  /   यूँ रहे आ /के मगर
क्या  ब ने बा   /त जहाँ बा/     त बनाये /  न बने

आदरणीय मोहन बेगोवाल जी 

इस प्रकार से मुझे समझ में नहीं आ रहा है आपने किस हर्फ़ को किस वजन में बांधा है| रेफरेंस के लिए आप तरही मिसरे की तक्तीअ देखिये और इसी प्रकार से अपनी ग़ज़ल की तक्तीअ भी कीजिये|

क्या/2/ब/1/ने/2/बा/2     त/1/ज/1/हाँ/2/बा/2    त/1/ब/1/ना/2/ये/2   न/1/ब/1/ने/2

मजा ही आ गया मिसरा ए तरह पर कही इन गजलों को पढ़कर...

सभी मु. शायरों को शानदार गजलों के लिए दिली मुबारकबाद...

||जय ओ बी ओ||

आदरणीय गुरुजन मैंने अपनी गज़ल कि यथासम्भव तक्तीअ की है मेरे द्वारा हुई त्रुटियाँ काफी कुछ समझ में आ गयी हैं किन्तु आप से एक विनती है कि एक बार कष्ट करके निरीक्षण कर ले क्या मैंने सही तक्तीअ कि है ताकि आगे गज़लों में मै सही तक्तीअ कर सकूं
सादर

क्यों भला याद तेरी मुझसे भुलाये न बने 2122/1122/1122/112
जख्म छिपता भी नही और दिखाए न बने 2122/1122/1122/112

बुझ गया दिल जो अभी तक था दिए के जैसा 2122/1122/1122/22
अब कोई और चरागाँ भी जलाए न बने 2122/1122/1122/112

मेरे वजूद पे काबिज वो इस कदर देखो 1212/1122/1212/22
ख्वाब आँखों पे कोई और सजाये न बने 2122/1122/1122/112

वो ऐसी उलझने देता रहा सदा मुझको 1212/1222/1212/22
न पास चैन है और दूर भी जाये न बने 1212/1222/1122/112

वो छोटी गलतियों से बात बिगड़ती ही गयी 1212/1212/1122/112
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने 2122/1122/1122/112

अनुराग जी यह आपने किस प्रकार तक्तीअ की है , इस प्रकार से मुझे समझ में नहीं आ रहा है आपने किस हर्फ़ को किस वजन में बांधा है| रेफरेंस के लिए आप तरही मिसरे की तक्तीअ देखिये और इसी प्रकार से अपनी ग़ज़ल की तक्तीअ भी कीजिये|

क्या/2/ब/1/ने/2/बा/2     त/1/ज/1/हाँ/2/बा/2    त/1/ब/1/ना/2/ये/2   न/1/ब/1/ने/2

 मिर्ज़ा ग़ालिब की कमाल की ग़ज़ल से लिया गए मिसरा-ए-तरह पर कमाल की गज़लें 

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