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OBO लाईव तरही मुशायरा-४ में पेश की गई ग़ज़लें

जनाब नवीन चतुर्वेदी जी

खारों के पास ही नाज़ुक गुलों का घर क्यूँ है|
मुद्दतों से वही मसला, वही उत्तर क्यूँ है|१|

पेट भरता चला आया युगों से जो सब का|
भाग्य में उस अभागे के, फकत ठोकर क्यूँ है|२|

सालहासाल जिसके वोट खींच रहे - संसद|
'थेगरों' से पटी उसकी शफ़क चद्दर क्यूँ है|३|

और कितनी बढ़ाएगा बता कीमत इसकी|
दृष्‍टि में तेरी, मेरे भाग की शक्कर क्यूँ है|४|

जो कि अल्लाह औ भगवान दोनो हैं इक ही|
फिर जमीँ पे कहीं मस्जिद, कहीं मन्दर क्यूँ है|५|

हर किसी को बराबर की न जब हासिल धरती|
कर्ज़ औ टेक्स का बोझा तो फिर सब पर क्यूँ है|६|

जो 'मसीहा' कहे खुद को 'सुलह' का 'अमरीका'|
तो 'किराए' पे सबको भेजता 'लश्कर' क्यूँ है|७|

शक्ल जैसी दिखे वैसी दिखाता है सबको|
क्रोध इतना हमें लेकिन आइने पर क्यूँ है|८|

उफ़ ये दस्तूर दुनिया में बनाया है किसने|
बेबसी के उदर से जन्मता शायर क्यूँ है|९|

बेमुरव्वत, बेहया, बेअदब, बेईमानो|
हाथ में आपके ये मज़हबी नश्तर क्यूँ है|१०|

खुद बता कर धता, पर्यावरण को अरसे से|
शोध अब कर रहे, हद लाँघता - सागर क्यूँ है|११|

"चाँद पर आशियाँ" के स्वप्न दृष्टा के दिल में|
बालकों की व्यथा सा, एलियन का डर क्यूँ है|१२|

बाँध-सड़कें-नहर-पुल सब पुराने हैं पुख़्ता|
काम लेकिन नया जो भी हुआ, जर्जर क्यूँ है|१३|

देश के कर्णधारो तुम बता दो बस इतना|
क़ायदे से बड़ा इस मुल्क में अफ़सर क्यूँ है|१४|

आपसी तालमेलों से जो बँटने हैं ठेके|
व्यर्थ में फिर छपा अख़बार में टेंडर क्यूँ है|१५|

ज़्यादहातर उसी का माल उठाती है दुनिया|
सिर्फ़ इतराज ये ही, "चीन की मोहर" क्यूँ है|१६|

आख़िरी मर्तबा हम कब मिले-बैठे-बोले|
याद के दायरों से दूर वो मंज़र क्यूँ है|१७|

शांति-सौहार्द का जिम्मा दिया रब ने जिनको|
आज दरम्यान उनके भी, 'इगो फेक्टर' क्यूँ है|१८|

आप सा दोस्त पाया, ख़ुशनसीबी है मेरी|
आप की बात, दुनिया से अलग हट कर क्यूँ है|१९|

सैंकड़ों छंद-कविता-शेर कह डाले, फिर भी|
'वो' नहीं कह सका - लगता मुझे अक्सर क्यूँ है|२०|

आप सा दोस्त पाया, ख़ुशनसीबी है मेरी|
आप की बात, दुनिया से अलग हट कर क्यूँ है

ये बहर है ज़रा टेढ़ी, नहीं नामुमकिन ये|
चंद हजरात में 'हौआ' इसे लेकर क्यूँ है|२१|

जाहिरा तौर पर जो मुस्कुराता दिखता है|
दर्द पलता रहे उसके सतत भीतर क्यूँ है|२२|

मंज़िलों तक पहुँचना हो नहीं वश में जिनके|
सिर्फ़ कहते वही, रह में पड़ा पत्थर क्यूँ है|२३|

दूसरों की तरफ उंगली उठाने से पहले|
सोच तो लें, हमें शिकवा, किसे लेकर - क्यूँ है|२४|

मुल्क के पार भी मशहूर है जिसकी मलमल|
दोजखी जिंदगी जीता वही बुनकर क्यूँ है|२५|

इस दफ़ा जाऊँगा शिर्डी, उसी से पूछूँगा|
राह तेरी, बता साईं, कठिन दुष्कर क्यूँ है|२६|

'संगणक' के जमाने में अजूबा लगता है|
फाइलों से पटा हर दूसरा दफ़्तर क्यूँ है|२७|

साल दर साल अरबों के बजट बनते, फिर भी|
कर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा हम पर क्यूँ है|२८|

कोर्ट का फ़ैसला सब ने कुबूला है तो फिर|
तू वकीलों के दर पे काटता चक्कर क्यूँ है|२९|

आपसी बात आपस में ही सुलझा करती हैं|
यार नाराज़गी तेरी जमाने पर क्यूँ है|३०|

वास्तविक जिंदगी या वर्चुअल लाइफ यारो|
आदमी हर जगह पे ढीट, घनचक्कर क्यूँ है|३१|

फ़ासले बढ़ रहे तब मौन थे जो, अब वो ही|
डिस्कशन कर रहे, पब्लिक चढी सर पर क्यूँ है|३२|

आरती आदमी की जो उतारा करते हैं|
आदमी में उन्हें दिखता नहीं ईश्वर क्यूँ है|३३|

मर्द भी सोचते अक्सर यही, आख़िर उनकी|
माँ-बहन-बेटियों की जिंदगी बदतर क्यूँ है|३४|

आदमी आदमी को खींचने का शैदाई|
आदमी आदमी से झूझता मर-मर क्यूँ है|३५|

आप खा कर समोसे देखिए तो ठेले पर|
जान जाओगे जमती भीड़ ठेले पर क्यूँ है|३६|

लोग जो मुंबई से दूर हैं, वो क्या जानें|
यंत्र सी जिंदगी जीता मुम्बईकर क्यूँ है|३७|

गाँव के लाड़लों को शहर अच्छे लगते हैं|
गाँव - शहरी कहे - इत्ता घणा सुंदर क्यूँ है|३८|

यार वसुधा हमारी क्यूँ नहीं मिलती हम को|
स्वर्ग या नर्क ही मिलता हमें मर कर क्यूँ है|३९|

काव्य की कुंज के जैसा लगे है ओबीओ|
नाचता मन-मयूरा धिनक-धिन य्हाँ पर क्यूँ है|४०|
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जो बनाता जलसाघर, खुद बेघर क्यूँ है|
सादगी का हर जानिब, ये मुक़द्दर क्यूँ है|१|

एक नाज़ुक सी ये डोरी है मुहब्बत यारो|
आदमी खींच रहा सख़्त पकड़ कर क्यूँ है|२

वक्त के साथ में चलता है सँभल कर वो ही|
जानता जो, चले इन्साँ यूँ अकड़ कर क्यूँ है|३|

एकटक राह तकी जिसकी उमर भर मैने|
वो निकल जाता यूँ नज़रों को बचा कर क्यूँ है|४|

आम इन्सान की भाषा में उसी की बातें|
शौक इत्ता सा ही मेरा ले दे कर क्यूँ है|५|

दूरदर्शन पर आए, बन बैठे ग़ालिब|
बोल दो छंद, बना वो रतनाकर क्यूँ है|६|

सैंकड़ों लोग लगा पूँजी भटकते फिरते|
पेशगी ले के हुआ गायब बिल्डर क्यूँ है|७|

शख्स जो मुल्क में रोटी न कमा पाता है
गैर मुल्कों में कमाता वो दबाकर क्यूँ है|८|

चंद हफ्तों में डबल माल बना कर देंगे|
ऐसी हर बात में दिखता मुझे चक्कर क्यूँ है|९|

आज कॉलेज से ज़्यादा तो हैं ट्यूशन चलते|
शारदे! आप की धरती पे ये मंज़र क्यूँ है|१०|

एक फॉरेन के यात्री ने ये पूछा मुझसे|
व्हाय! हर एक गुफा में चमगादर क्यूँ है|११|

बाहरी लोग ही मुंबई में जियादा रहते|
उन से ही रंज का दस्तूर यहाँ पर क्यूँ हैं|१२|

जो भी आया, उसे अपनाया, औ धोखा खाया|
ज़िक्र इस का ही किताबों में अधिकतर क्यूँ हैं|१३|

इस दफ़ा फिर से विवादों में घिरा है पोंटिंग|
द्वंद उस के लिए किरकेट से बढ़ कर क्यूँ हैं|१४|

व्यस्त हूँ, आ नहीं पाऊँगा, ये कहता है जो|
बिन बुलाए ही चला जाता वहाँ पर क्यूँ हैं|१५|

यार-यारों का तमाशा ही बनाते रहते|
नेट पे जारी घमासान बराबर क्यूँ हैं|१६|
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जनाब अरुण कुमार पाण्डेय जी

ऐसा बिगड़ा हुआ इस दौर का मंज़र क्यूँ है,
हर ज़ुबां मीठी मगर हाथ में खँजर क्यूँ है.

कितने मुद्दे सड़क पे तोड़ रहे तनहा दम ,
फिर भी हर शख्स छुपा घर के ही अन्दर क्यूँ है.

मिली आज़ादी मगर बापू ये कैसा रामराज ,
कहीं इफरात कहीं फाका ये अंतर क्यूँ है.

कल जहां बाग थे तुमने बना लिए हैं फ़्लैट,
और अब पूछते हो शहर में बन्दर क्यूँ है.

फिर क्या टकराए जहाज़ और फिर बिखरा है तेल ,
मछलियाँ तड़प रहीं काला समंदर क्यूँ है.

माँ कहा करती थी रहता है खुदा हर शै में,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यूँ है.

अफसरों और लीडरों की पीढियां सिक्योर्ड,
आदमी - आम का लटका हुआ लंगर क्यूँ है.

तेरे जादू में तो तय ये था कि जी उट्ठेगा,
हो रहा फेल मदारी तेरा मंतर क्यूँ है.

मन हो चंगा तो कठौती में भी गंगा होगी ,
फिर कोई पीर फ़कीर और कलंदर क्यूँ है.
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पल्लव पंचोली "मासूम" जी

आँख में चुभने लगा आज ये मंज़र क्यों है ?
आग मे आज यहाँ झुलसे सभी घर क्यों है ?

आसमाँ बाँट सका ना कोई इंसान यहाँ
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दिर क्यूँ है?

जाने क्या ठान रखा आज हवाओं ने भी
चुप है आकाश मगर दिल मे बवंडर क्यों है ?

जिसने दौलत को चुना था तोड़ कर दिल मेरा
हाल उसका मेरे हालात से बदतर क्यों है ?

मिलने गर आए हो तुम मुझसे गले ए यारों
हाथ के पीछे छुपा आज खंज़र क्यों है ?
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जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी

बेवफा मेर’ हि दिल में य’ त’रा दर क्यूँ है
जी रहा आज भि आशिक वहिं मर मर क्यूँ है।

वो नहीं जानति रोजा न हि कलमा न नमाँ
ये बता फिर उसि चौखट प’ तेरा घर क्यूँ है।

जानते हैं सभि बस प्रेम म’ बसता है तू
फिर जमीं पर कहिं मस्जिद कहिं मन्दिर क्यूँ है।

तू नहीं साँप न ही साँप क’ बच्चा है तो
तेरि हर बात म’ फिर ज़हर सअ असर क्य़ूँ है।

एक चट्टान के टुकड़े हँ य’ सारे ‘सज्जन’
तबिक कंकड़ इक पत्थर इक शंकर क्यूँ है।

रोज लिख देते हैं हम प्यार प’ ग़ज़लें कितनी
हर तरफ़ फिर भि य’ नफ़रत क हि मंजर क्यूँ है।
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जनाब मोईन शम्सी जी

वो तेरे दिल में भी रहता है मेरे दिल में भी,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दर क्यूं है !

सब के होटों पे मुहब्बत के तराने हैं रवाँ,
पर नज़र आ रहा हर हाथ में ख़न्जर क्यूं है !

क्यूं हर इक चेहरे पे है कर्ब की ख़ामोश लकीर,
आंसुओं का यहां आंखों में समन्दर क्यूं है !

तू तो हिन्दू है मैं मुस्लिम हूं ज़रा ये तो बता,
रहता अक्सर तेरे कांधे पे मेरा सर क्यूं है !

काम इसका है अंधेरे में दिया दिखलाना,
राह भटका रहा ’शम्सी’ को ये रहबर क्यों है !
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मोहतरमा मुमताज़ नाज़ा जी

हर किसी मोड़ पे उट्ठा कोई महशर क्यूँ है
सहमा सहमा सा हर एक मोड़ पे रहबर क्यूँ है

ऐसा लगता है के अब के तो क़ज़ा बरसी है
पैरहन सारा का सारा लहू में तर क्यूँ है

हर कोई खौफज़दा हर कोई वहशत का शिकार
ये तलातुम सा हर एक ज़ात के अन्दर क्यूँ है

ये यजीदों की हुकूमत है के शैतान का शर
शाहराहों पे लहूखेज़ ये मंज़र क्यूँ है

हर इक इंसान पे शैतान का शुबहा हो जाए
इस क़दर आज त'अस्सुब का वो ख़ूगर क्यूँ है

वो है हर शय में नुमायाँ ये सभी मानते हैं
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यूँ है

पाँव फैलाऊँ मैं कैसे के न सर खुल जाए
इतनी छोटी सी इलाही मेरी चादर क्यूँ है

किस की क़ुर्बानी का या रब ये हुआ है तालिब
इतना 'मुमताज़' ग़ज़बनाक समंदर क्यूँ है
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डॉ ब्रिजेश त्रिपाठी जी

इन्सान बने रहने में आती है क्यूँ शरम...
फितरत में यूँ छिपता हुआ बन्दर क्यूँ है ?

ऐ आदमी! तेरा ज़मीर सो गया है क्या..
हैवानियत का शुरूर... इतना तेरे अन्दर क्यूँ है..?

गर खुदा का घर है, इंसान का ये मन ...
तो वहां गुरूर का गरजता हुआ समंदर क्यूँ है...?

रहने की तेरे क्या तुझे कुछ कमी पड़ गयी ...
ये मंदर और मस्जिद का बवंडर क्यूँ है ?

ये फलक तो दीखता है खाली-खाली
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यूँ है ...?

कब कहा भगवान ने, तुम मन में स्याही पोत लो...
द्वेष का दरिया बताओ फिर , मन के अन्दर क्यों है...

नूर-ए-मोहब्बत को जिसने दूर तक फैला दिया ...
आज उसके घर पर ज़द्दोज़हद का समंदर क्यों है

जो ज़माने से अयोध्या थी ...अवध थी...
जंग ओ तकरार का आज वहां मंज़र क्यूँ है?

गर खुदा का घर ये अपना साफ़ सुथरा दिल ही है ..
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यूँ है?

ज़िन्दगी का दर्द बयां से बाहर हो गया अब...
सुकून-ए-मौत से फिर भी लगता डर क्यूँ है. ?

बहुत दिन हो गए हैं अब तुम्हारे दीदार हुए ...
ओ नूर-ए- चश्म! तू आँखों से दर बदर क्यूँ है..?

ज़र्रा-ज़र्रा हुआ रोशन तेरे नूर से या रब
इन्सान की फितरत इतनी स्याह,मगर क्यूँ है

रंगीन फूल ओ पत्ती ये ज़मीं आसमां भी है ..
न जाने स्याही ही हमें भायी इस क़दर क्यूँ है ?

आओ बैठे यहाँ पास में , मन की बात करें ..
गिरह को खोलकर रखने में इतना डर क्यूँ है ?

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कुमारी अनुपमा जी

जिंदगी तनहा तनहा इस कदर क्यूँ है
सब हासिल तो भटकता मन दर बदर क्यूँ है!

खो गयी बीते शाम ही सारी खुशबू,
पंखुड़ियों का ऐसा क्षणिक सफ़र क्यूँ है!

आसमान छत है और जमीन ही ठिकाना है,
ठिठुरती रूहों पे बरपता ऐसा कहर क्यूँ है!

हवाओं में गाते परिंदों की ताने घुली है,
इंसानी फितरतों में घुला इतना जहर क्यूँ है!

झूम रही हैं लताएँ जाने किस ख़ुशी में,
मेरे आँगन में ठहरा ये उदास पहर क्यूँ है!

सुना है फैली हुई अमन की बस्ती है यहाँ,
नफरतों के लिए बदनाम फिर ये शहर क्यूँ है!

हर आँख में पानी, रोता हुआ हर दिल,
फिर पास से गुजरता सूखा ये नहर क्यूँ है!

हर पल हार ही तो रहें हैं जिंदगी,
फिर बेवजह ये जश्न की लहर क्यूँ है!

वो दिल में रहता है हर किसी के,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है!
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सुबोध कुमार शरद जी

नेकी से गरीब हरकोई खुदगर्जी से अमीर क्यूं है
इंसानियत के रंगो से फिकी इंसानी तस्वीर क्यूं है

अपनी बदजनी का एहसास नहीं करे इशारा गै़रों पर
बेईमानी है मनसुबा सबोंका सोया ज़मीर क्यूं है

देख इंसानो की फितरत आज ख़ुदाई भी शर्मसार
जो नहीं सच फिर भाईयों के बीच शमसीर क्यूं है

फ़र्ज से जुदा बेफ्रिक राहों पर जीते हैं सभी यहाँ
और दर्द पर ममाल करे ऐसी तकदीर क्यूं है

जब इश्वर-अल्लाह एक शरद एक राम-रहीम
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदीर क्यूं है !
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी

फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?

फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?

चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?

कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?

धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?

ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यों है?

नीर जब आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?

आदमी में छिपा, हर वक़्त ये बंदर क्यों है?
कभी हिटलर है, कभी मस्त कलंदर क्यों है??

आइना पूछता है, मेरी हकीकत क्या है?
कभी बाहर है, कभी वो छिपी अंदर क्यों है??

रोता कश्मीर भी है और कलपता है अवध.
आम इंसान बना आज छछूंदर क्यों है??
(छछूंदर शब्द यहाँ स्वादहीनता पैदा कर रहा है)

जब तलक हाथ में पैसा था, सगी थी दुनिया.
आज साथी जमीं, आकाश समंदर क्यों है??

उसने पर्वत, नदी, पेड़ों से बसाया था जहां.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यों है??

गुरु गोरख को नहीं आज तलक है मालुम.
जब भी आया तो भगा दूर मछंदर क्यों है??

हाथ खाली रहा, आया औ' गया जब भी 'सलिल'
फिर भी इंसान की चाहत ये सिकंदर क्यों है??

जिसने औरत को 'सलिल' जिस्म कहा औ' माना.
उसमें दुनिया को दिखा देव-पुरंदर क्यों है??

काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है?
मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है??

खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है?
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है?

जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत.
भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है??

जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को.
आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है??

एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला.
पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है??

लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम.
कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है??

पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे-
कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है??

ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको.
राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है??

हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे.
बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है??

पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ.
ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है??

फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते?
पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है??

बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में.
काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है??

तीन झगड़े की वज़ह- जर, जमीन, जोरू हैं.
ये अगर सच है तो इन बिन न रहा नर क्यों है??

रोज कहते हो तुम: 'हक समान है सबको"
ये भी बोलो, कोई बेहतर कोई कमतर क्यों है??

अब न जुम्मन है, न अलगू, न रही खाला ही.
कौन समझाए बसा प्रेम में ईश्वर क्यों है??

रुक्न का, वज्न का, बहरों का तनिक ध्यान धरो.
बा-असर थी जो ग़ज़ल, आज बे-असर क्यों है??

दल-बदल खूब किया, दिल भी बदल कर देखो.
एक का कंधा रखे दूसरे का सर क्यों है??

दर-ब-दर ये न फिरे, वे भी दर-ब-दर न फिरे.
आदमी आम ही फिरता रहा दर-दर क्यों है??

कहकहे अपने उसके आँसुओं में डूबे हैं.
निशानी अपने बुजुर्गों की गुम शजर क्यों है??

लिख रहा खूब 'सलिल', खूबियाँ नहीं लेकिन.
बात बेबात कही, ये हुआ अक्सर क्यों है??

कसम खुदा की, शपथ राम की, लेकर लड़ते.
काले कोटों का 'सलिल', संग गला तर क्यों है??

बेअसर प्यार मगर बाअसर नफरत है 'सलिल'.
हाय रे मुल्क! सियासत- जमीं बंजर क्यों है??
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जनाब राणा प्रताप सिंह जी

सारी दुनिया में छिड़ी जंग ये आखिर क्यूँ है
अम्न के देश में छब्बीस नवम्बर क्यूँ है

आज धरती पे हर इन्सान जुदा लगता है
चेहरे मासूम मगर हाँथ में पत्थर क्यूँ है

जब भी साहिल पे मुझे लगता है तन्हा तन्हा
तेरी यादों को बहा लाता समंदर क्यूँ है

दीनो ईमान जो कायम रख आगे बढ़ता
जाने उसको ही लगी राह में ठोकर क्यूँ है

जबकि इस बाग के सब फूल ही मुरझाये हैं
फिर भी मंडराता चला आया ये मधुकर क्यूँ है

मुन्तजिर जो हैं उनको रोज़ ऐसा लगता है
उफ्क पे जा पहुंचा आज दिवाकर क्यूँ है

सादगी सबको सिखाता जो पहन कर खादी
ले के चलता वो इतने लाव और लश्कर क्यूँ है

नाप लेता था जो आकाश की ऊंचाई को
उसके हिस्से में ही आया यहाँ पिंजर क्यूँ है

गूंजती रहती जो कानो में मेरे छन छन छन
आज पैरों में नहीं तेरे वो नूपुर क्यूँ है

या खुदा कोई मुझे ये तो बताये आ के
सबको दो जून कि रोटी ना मयस्सर क्यूँ है

जब ये कहते हैं कि बस एक है ऊपर वाला
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है
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जनाब गणेश जी बागी जी

उभरती जेहन मे बात ये अक्सर क्यू है,
सेठ के चौखट कोई भुखा नौकर क्यू है,

पूजने से बुत, आजान से किस्मत बनती,
फिर जमीं पर कही कर्जा कही जागिर क्यू है,

लड़कियां मचल रही रेस्तरा मे जाकर,
चेहरा यू ढकना फैशन आखिर क्यू है ,

हम सभी गर एक ही मालिक के है बंदे,
फिर जमीं पर कही मस्जिद कही मंदिर क्यू है,

मीठे की तासीर अब बदल चुकी है "बागी"
चाय फीकी लगी खूं मे शक्कर क्यू है ,

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जनाब हिलाल अहमद हिलाल जी

बदला बदला सा मेरे हिंद का मंज़र क्यूँ है ,
आज हिन्दू में मुसलमान मै अंतर क्यूँ है ?

सोचता हूँ के ये परदेस मुक़द्दर क्यूँ है,
मेरा घर हद्दे नज़र से मेरी बाहर क्यूँ है ?

खुद ही इक बोझ बना रक्खा है दिल पे तुने,
जो तेरे दिल में है वो दिल के ही अन्दर क्यूँ है ?

लाख कोशिश के भी दाखिल न हुआ मै दिल में,
कांच का दिल तो सुना था तेरा पत्थर क्यूँ है ?

किसने तोडा मेरे दरया-ऐ-मुहब्बत का सुकूत,
एक अरसे से जो खामोश था मुज़्तर क्यों है?

साक़िया कितनी ज़रूरत है मुझे अब मय की,
ये बता आज भी ख़ाली मेरा साग़र क्यूँ है ?

खुद में अखलाक-ओ-मुहब्बत न रवादारी है,
फिर भी शिकवा है ख़फा अपना बिरादर क्यूँ है?

कल तो देते थे सभी ज़र्फ़-ऐ-समंदर की मिसाल,
अब समंदर का मिज़ाज आपे से बाहर क्यूँ है?

"हम पुजारी भी नहीं और नमाज़ी भी नहीं "
फिर ज़मी पर कही मस्जिद कही मंदर क्यूँ है?

मेरे अहबाब तो महलों के मकीं बन बैठे,
मेरे घर पे अभी तक बांस का छप्पर क्यूँ है?

उनको बतलाओ के बुजुर्गों का करम है इस पर,
जो ये कहते है 'हिलाल ' अच्छा सुखनवर क्यूँ है?
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योगराज प्रभाकर

मेरे हाथों की लकीरों का ये मंज़र क्यों है ,
मेरे पैरों के मुक़द्दर में ये चक्कर क्यूँ है !

तेरी नगरी में सुकूँ अमन दिखे है हर सू ,
तो छुपा लोगों के दस्ताने में ख़ंजर क्यूँ है !

बाढ़ ले आई जटायों से निकलकर गंगा,
इस तबाही को देख मौन सा शंकर क्यूँ है !

गर हकीकत है कि वो अस्मां में रहता है,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दर क्यूँ है !

क्यूं ज़मीं से जुड़ा इंसान अनाड़ी है यहाँ.
जो हवा में उड़े कहलाए धुरंधर क्यूँ है !

लाख ढूँढा कोई पोरस ही दिखाई न दिया,
अब ये जाना कि दुखी आज सिकंदर क्यूँ है !

क्यूँ दिखाई नही देता है तुझे राम लला,
तेरी आँखों में बसा आज भी बाबर क्यूँ है !
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जनाब स्पंदन पाण्डेय जी

आज हर क़तरा नुमाइश में समंदर क्यूँ है
सबकी ख्वाहिश यहाँ औक़ात से बढ़ कर क्यूँ है

फसल नफरत की तो उग जाती है हर मौसम में
और मुहब्बत की ज़मीं बरसों से बंजर क्यूँ है

मेरे जिस राम ने इस दुनिया को तामीर किया
वजहे तखरीब यहाँ उसका ही मंदिर क्यूँ है

मुल्क आज़ाद हुए एक ज़माना गुज़रा
फिर भी मगरिब की निगाहों में ये नौकर क्यूँ है

चीख ज़ख्मों की है और आहो फुगाँ अश्कों की
आज इक शोर हर इक शख्स के अन्दर क्यूँ है

जब भी तारीख पढ़ी एक सवाल आया है
खूँ में लिथड़ी हुई तहजीब की चादर क्यूँ है

जिसने दुनिया के लिए खाबों की पोशाक बुनी
और उरयानी ही शाइर का मुक़द्दर क्यूँ है

बनके आवारा भटकता है मेरी रातों में
तिफ्ल ये नींद का इस आँख से बेघर क्यूँ है

फ़िक्र बस इतनी है शैतान से रहबर को "सहाब"
कोई इंसान मुहब्बत की सड़क पर क्यूँ है
----------------------------------------------------
जनाब पुरषोत्तम आजर साहिब

बुत में भगवान अगर है? लगे पथ्थर क्यूँ है
नाम धर्मो के जुदा ,फ़िर खुदा का घर क्यूँ है

झांक कर देखो जरा मन में ही रब है रहता
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दिर क्यूँ है

तू खफ़ा किस लिए , मेरी जाँ बता दे इतना
जान हाजिर है , तेरे हाथ में खंजर क्यूँ है

लौट के फिर से बहारों चली आओ नभ से
बे-बसी का ही निगाहों में ये मंजर क्यूँ है

हाथों की मैं लकीरों को मिटा तो दूँ लेकिन
गुम न हो जाऊं कहीं दिल में मेरे डर क्यूँ है.

मोल बिकती नहीं तहजीब ये दुनिया वालो
डूब मरने के लिए ही पानी दूभर क्यूँ है !

जैसी बोयेगा फसल वैसे ही तो काटेगा
आम खाने हैं तो कांटो पे तू निर्भर क्यूँ है
--------------------------------------------------
जनाब आशीष यादव जी

आज हमको ही लड़ते ये नासीर क्यूँ हैं|
उनके व्यक्तव्य ये बे पांव औ' बेसिर क्यूँ हैं||

पांच साल बीत रहे गांव भ्रमण को उनके|
जोड़ कर हाथ दिखे आज वो आखिर क्यूँ हैं||

है प्रजातंत्र या यूँ कहें की राज जनता का|
फिर यहाँ नेता ही काबिज़ औ' कादिर क्यूँ हैं||

भूमिहीन झुरी था, पट्टा क्यूँ पेंहटुल को हुआ|
ये जनता सीधी, चमचा इतना शातिर क्यूँ है||

बेअदब से किया रुसवा तुने दीवाने को|
आज सिने में उठती उसकी ही तासीर क्यूँ है||

घुँट रहा है गला ऐतबार का जमाने में|
राज़ को छोड़ कर भागी आज सिमरन क्यूँ है||

साथ मिल जाए तो कट जाए ख़ुशी से ये सफ़र|
जान कर के भी लड़ता ये मुसाफिर क्यूँ है||

एक ही है वो ये कहते तुम, हम भी कहते हैं|
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है||

याद मम्मी की औ' डैडी की क्यूँ नहीं आती|
चिंता चौबीस घंटे माशूक की खातिर क्यूँ है||
------------------------------------------------------
सय्यद बसीरुल हसन "वफ़ा नकवी"

मेरे होंठों पे भला प्यास का सागर क्यूँ है !
और दरियाओं का हर सिम्त से लश्कर क्यों है !

इस से पहले तो कभी प्यार का तूफ़ान ना था,
आज ये शख्स मुहब्बत का समंदर क्यूँ है !

क्या किसी दौर की तारिख है लिखनी इसको,
हाथ में थामे कलम आज सितमगर क्यूँ है !

हम क़बीलों में तो बांटा नहीं करते रब को
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यूँ है !

भूल बैठा है ज़माने कि हर इक नेमत को
दिल मेरा तेरी मुहब्बत में कलंदर क्यों है !

क्या किसी आईना खाए से गुज़र है तेरा,
सोचता हूँ कि तेरे हाथ में पत्थर क्यूँ है !

सूखे पत्ते ही बताएं तो कोई राज़ खुले,
शाख पर बैठा हुआ ज़ख़्मी कबूतर क्यूँ है !

क्यूँ नहीं रास मुझे घर की इमारत आती
पूछता मुझसे नहीं कोई सफ़र पर क्यूँ है !

क्या हुआ शाम का रंगीन चमकता चेहरा
दूर तक सिर्फ उदासी का ही मंज़र क्यूँ है !

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Comment by Abhinav Arun on October 17, 2010 at 9:11am
लाजवाब था तरही चार मुशायरा !!फिर पढ़ा क्या ताजगी है.वाह !!!धन्यवाद प्रभाकर जी.

कृपया ध्यान दे...

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