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ग़ज़ल (अय्यूब खान "बिस्मिल")

कर दिया आम मिरे इश्क़ का चर्चा देखो
देखो ज़ालिम कि मुहब्बत का तरीक़ा देखो

याद करना कि मिरे दर्द कि शिद्दत क्या थी
खुद को ज़र्रों में कभी तुम जो बिखरता देखो

खूं तमन्ना का मुसलसल यहाँ बहता है अब
मेरी आँखों में है इक दर्द का दरिया देखो

यूँ सुना है कि वो नादिम है जफ़ा पे अपनी
उसके चेहरे पे जफाओं का पसीना देखो

अपने हाथों से सजाके में करूँगा रुखसत
कर लिया है मेने पत्थर का कलेजा देखो

ये हिना सुर्ख ज़रा और भी हो जायेगी
डालके क़तरा जो इक मैरें लहू का देखो

अपने बिस्मिल का भी दरमा न हुआ उनसे तो
और करते हैं मसीहाई का दावा देखो

(अय्यूब ख़ान "बिस्मिल")

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 638

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Comment by MAROOF KHAN on April 9, 2015 at 8:04pm

khoobsoorat ghazal.... daad haazir e khidmat hai

Comment by Ajay Agyat on November 30, 2014 at 5:19pm

वाह... 

Comment by Meena Pathak on November 25, 2014 at 4:53pm

बेहद्द उम्दा ... बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on October 28, 2014 at 11:12am

बहुत सुन्दर गजल  ! आपका बधाई !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 27, 2014 at 7:45pm

जनाब बिस्मिल साहब बेहद दिलकश ग़ज़ल कही है आपने दिली दाद कुबूल फरमाएँ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 25, 2014 at 7:34pm

बहुत खूब ..वाह वाह 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on October 25, 2014 at 6:14am
क्या कहने जनाब
लाजवाब
बाकमाल

दिली दाद क़ुबूल फ़रमाएं

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