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लम्हों की तितलियाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर ' ( गजल )

२२१/२१२१/२२२/१२१२


धन से न आप तोलिए लम्हों की तितलियाँ
कहना फजूल खोलिए लम्हों की तितलियाँ।१।

****
उड़ती हैं आसपास नित सबके मचल - मचल
पकड़ी हैं किस ने बोलिए लम्हों की तितलियाँ।२।

****
सुनते  जमाना  उन  का ही  होता  रहा  सदा
फिरते हैं साथ जो  लिए लम्हों की तितलियाँ।३।

****
किस्मत हैं लाए  साथ  में  तुमसे ही ब्याहने
कहती हैं द्वार खोलिए लम्हों की तितलियाँ।४।

****
जिसने न खोला  द्वार  फिर आती कभी नहीं
कितना भी चाहे रो लिए लम्हों की तितलियाँ।५।

****
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2019 at 5:39am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल की भूरीभूरी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by Sushil Sarna on November 26, 2019 at 4:24pm

धन से न आप तोलिए लम्हों की तितलियाँ
कहना फजूल खोलिए लम्हों की तितलियाँ।१।

****
उड़ती हैं आसपास नित सबके मचल - मचल
पकड़ी हैं किस ने बोलिए लम्हों की तितलियाँ।२।


वाह वाह वाह आदरणीय बहुत ही दिलकश अंदाज़ है आपका अहसासों को बयाँ करने का। खूबसूरत अशआर की इस ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई सर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2019 at 5:15am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 25, 2019 at 12:14pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

जिसने न खोला  द्वार  फिर आती कभी नहीं
कितना भी चाहे रो लिए लम्हों की तितलियाँ।

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