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ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए(५१)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए

अपना ही दर्द ग़ैर का लगता है इसलिए'

**

जब और कोई राह न सूझे ग़रीब को

रस्ता हुज़ूर ज़ुर्म का चुनता है इसलिए

**

बाज़ार के उसूल हुए लागू इश्क़ पर

बिकता है ख़ूब इन दिनों सस्ता है इसलिए

**

आसाँ न दरकिनार उसे करना ज़ीस्त से

दिल का हुज़ूर आपके टुकड़ा है इसलिए

**

उनके ज़मीर के हुए चर्चे जहान में

मिट्टी के भाव में उसे बेचा है इसलिए

**

ना-जायज आप फ़ायदा उसका उठायें मत

हद से ज़ियादा आदमी अच्छा है इसलिए

**

आते हैं ग़म भी ज़ीस्त में अक़्सर ख़ुशी के बअ'द 

शायद बहुत क़रीब का रिश्ता है इसलिए

**

कुछ लोग दाद क्यों तुझे देते नहीं 'तुरंत'

अब भी सुख़नवरी में तू कच्चा है इसलिए

**

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

२८/०६/२०१९

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 22, 2019 at 10:34pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय  Samar kabeer साहेब | 

सलामत रहें | 

Comment by Samar kabeer on July 22, 2019 at 6:36pm

मतला यूँ कर सकते हैं:-

'ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए

अपना ही दर्द ग़ैर का लगता है इसलिए'

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 21, 2019 at 12:26am

आदरणीय Samar kabeer साहेब ,कुछ कुछ इसका अहसास मुझे भी था | लेकिन तात्कालिक  उपाय कुछ सूझा नहीं, क्या कोई उपाय हो सकता है ? सादर | पड़ती है मार.... को तो हटा सकते हैं लेकिन मतले क्या क्या किया जाये ? कृपया रास्ता दिखाएँ | "अपना सा दर्द गैर का लगता है इसलिए " क्या सही रहेगा ? सादर | 

Comment by Samar kabeer on July 3, 2019 at 2:51pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'लगता है दर्द ग़ैर का अपना है इसलिए'

इस मिसरे में रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो सका,देखियेगा ।

'पड़ती है मार पर उसे सच्चा है इसलिए'

इस मिसरे का शिल्प कमज़ोर है,आप जो कहना चाहते हैं स्पष्ट नहीं हुआ,देखियेगा ।

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