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ग़ज़ल
2122 2122 2122 212
नफरतों को छोड़ लगता पास चल कर आ गए
हो न कुर्सी दूर फिर, वो दल बदल कर आ गए।

जंगलों पे राज करने का जुनूँ जो सर चढ़ा
शेर जैसी शक्ल में गीदड़ भी ढल कर आ गए।

इश्क में देखो उन्होंने यूँ निभाई है वफ़ा
चाहने वाले के सारे ख़्वाब दल कर आ गए।

ठंड की जो चाह में उन तक गए ले मन-बदन
गुप्त शोलों में वो बस चुपचाप जल कर आ गए।

सामने कमजोर प्राणी उनको जो दिखने लगा
है गज़ब सारे शिकारी ही मचल कर आ गए।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 30, 2019 at 9:13pm

आदरणीय समर कबीर सर, सादर नमन! उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by Samar kabeer on January 29, 2019 at 10:56am

जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 28, 2019 at 11:19pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर सादर नमन सह आभारं

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 28, 2019 at 11:18pm

आदरणीय सुर्खाब बशर साहब सादर नमन सह हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 28, 2019 at 11:17pm

आदरणीय दिगम्बर नासवा जी सादर नमन, उत्साहवर्धन एवं अनुमोदन के लिए सादर हारदिक् आभारं

Comment by Surkhab Bashar on January 28, 2019 at 11:48am

आ.  राणा जी बहुत  उम्दा ग़ज़ल  है बधाई स्वीकार करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 28, 2019 at 7:11am

आ. भाई सतविंद्र जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by दिगंबर नासवा on January 27, 2019 at 7:37pm

अच्छी ग़ज़ल है राणा जी ... 

हर शेर में कहन स्पष्ट है ... बहुत बधाई हो ...

कृपया ध्यान दे...

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