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ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

              ग़ज़ल 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ
अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना
हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं
बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए
भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले
शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग रही
इस तरफ आजकल बंद हैं खिड़कियाँ

क्रोध की आग है आग से भी बुरी
फूँक दो आग में मन की सब तल्ख़ियाँ

इक नज़र खुश्क मौसम पे जो डाल दो
बोलना सीख जायेंगी खामोशियाँ

रास्ता अपने जाने का रखने लगीं 

आजकल घर बनाती हैं जब लड़कियाँ 


प्रश्न यह पूछना आसमाँ से "सुजान"
निर्धनों पर ही क्यों गिरती हैं बिजलियाँ. 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by सूबे सिंह सुजान on January 31, 2019 at 5:44am

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया , जनाब आपने मेरा ध्यान मेरी गलती की ओर दिलवाया आपका बेहद शुक्रिया । कोई जल्दबाजी में ऐसी गलती हो गई हो शायद ।लेकिन जनाब मेरा ऐसा कहीं कोई आशय नहीं रहा है ।

ग़ज़ल की कोशिश की है जो हिन्दी के शब्दों को तरजह से बात कहने की कोशिश है ।आपने पढ़ा व सटीक टिप्पणी दी बहुत बहुत शुक्रिया जनाब 

Comment by नाथ सोनांचली on January 30, 2019 at 10:32pm

आद0 सूबे सिंह सुजान जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बढ़िया प्रयास है, बधाई स्वीकार कीजिये।

एक निवेदन है,, इस मंच पर जिस भी व्यक्ति का नाम लिया जाता है उसकेसाथ आदर सूचक शब्द जैसे आदरणीय, जनाब इत्यादि लगाते हैं। उम्मीद है आप ध्यानदेंगे। एक बात और- यहाँ सोशल मीडिया जैसी एक दो शब्दों की काम चालाऊ प्रतिक्रिया उचित नहीं है। सादर

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 28, 2019 at 11:24am

समर कबीर जी, 

आपने ठीक पकड़ी गलती, बहर,अर्कान तो यही हैं,हाँ इस मिसरे को ठीक करना होगा ।

लेकिन अब एडिट नहीं कर पायेंगे ।

मिसरा यूँ हो जाएगा ।

"जितने पशु पक्षी थे,उतने वाहन हुए "

आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on January 28, 2019 at 10:51am

जनाब सूबे सिंह सूजन जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

आपने ग़ज़ल के ये अरकान लिए हैं 212 212 212 212 ।

'पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए'

ये मिसरा मुझे लय में नहीं लगा,देखियेगा ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 27, 2019 at 9:22am

Ravi shukla ji, रवि जी 

बहर इस प्रकार है ।

212212212212

Comment by Ravi Shukla on January 26, 2019 at 10:21pm

आदरणीय सूबे सिंह जी गजल के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई ग़ज़ल ख्रआ कान भी लिख दीजिये थोड़ी सुविधा हो जाती

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 25, 2019 at 3:34pm

बहुत बहुत शुक्रिया 

कृपया ध्यान दे...

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