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गुल तेरे हम ख्वार लिए बैठे हैं....

तेरी याद के अम्बार लिए बैठे हैं,

गुल तेरे हम ख्वार लिए बैठे हैं.

 

क़त्ल कर.. दफना गया है तू जिसको,

हाथो मे वोही प्यार लिए बैठे हैं.

 

जीत का सेहरा तो तेरे सर पे सजा,

हाथ मैं हम 'हार' लिए बैठे हैं.

 

दुश्मन भी शरमा गया.. अब मुझसे,

सीने मैं, इतने वार लिए बैठे हैं.

 

पत्थर का, मुझे देखके दिल भर आया,

आँखों मैं वोह. गुबार लिए बैठे हैं,

 

'उफ़' नहीं मेरी कभी दुनिया ने सुनी,

सदा-ए-दिल सर-ए-बाज़ार लिए बैठे हैं.

 

ताउम्र ग़म हो गया है हमसाया,

'फौत' खुशियों का ये मज़ार लिए बैठे हैं.

 

इम्काँ नहीं .. तेरे आने का मगर,

दिल-ए-जिद्द मे.. इंतज़ार लिए बैठे हैं,

 

इजाफा.. तेरी इज्ज़त मे हो गया होगा.

तेरे क़दमो मे ये दस्तार लिए बैठे हैं,

 

तहरीर मायूस हो गयी है मेरी,

ग़म मे डूबे हम अशआर लिए बैठे हैं,

 

इमरोज़ तड़पता रहे 'प्यासा पंछी',

लोग पहलु मे छुपा आब लिए बैठे हैं.

 

चाक है सीना जिगर पे वार करो, '

इमरान' खुद को.. तैयार लिए बैठे हैं...

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Comment

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Comment by इमरान खान on June 15, 2011 at 6:05pm
वंदना जी शानदार तो नहीं थी मगर आपकी दाद ने शानदार बना दी..शुक्रिया दिल से..
Comment by इमरान खान on June 13, 2011 at 10:35am
बहुत शुक्रिया गणेश भाई, अपने दाद दी ये ख़ुशी की बात है मगर आपने मेरी इस्लाह की ये बहुत बड़ी ख़ुशी की बात है... बिलकुल सच कहा अपने उस शेर मैं तरमीम की ज़रुरत है....

हिलाल भाई मेरे लिए आप जैसे महफ़िल वाले लोगों को मुझ जैसे खुदी मैं डूबे रहने वाले शख्स के शेर पसंद आये...क्या कहूं अल्फाज़ ही नहीं मेरे पास जो ख़ुशी बयां कर सकें ..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 13, 2011 at 10:03am

इमरान भाई बहुत ही खुबसूरत ख्यालात से भरी ग़ज़ल कही है आपने, सभी शे'र अच्छे लगे, केवल एक शे'र में काफिया निभाने में आपने गलती कर दिया है ..........

इमरोज़ तड़पता रहे 'प्यासा पंछी',

लोग पहलु मे छुपा आब लिए बैठे हैं.

 

लोग पहलु में आब बेकार लिए बैठे है

 

कुछ इस तरह किया जा सकता है |

दाद कुबूल कीजिये इस ग़ज़ल पर |

Comment by Hilal Badayuni on June 13, 2011 at 9:46am

 

तेरी याद के अम्बार लिए बैठे हैं,

गुल तेरे हम ख्वार लिए बैठे हैं.

जीत का सेहरा तो तेरे सर पे सजा,

हाथ मैं हम 'हार' लिए बैठे हैं.

जीत का सेहरा तो तेरे सर पे सजा,

हाथ मैं हम 'हार' लिए बैठे हैं.

दुश्मन भी शरमा गया.. अब मुझसे,

सीने मैं, इतने वार लिए बैठे हैं.

 

इम्काँ नहीं .. तेरे आने का मगर,

दिल-ए-जिद्द मे.. इंतज़ार लिए बैठे हैं,

 

इजाफा.. तेरी इज्ज़त मे हो गया होगा.

तेरे क़दमो मे ये दस्तार लिए बैठे हैं,

 

 

bhai waah bade achche ache sher post kiye hai pasand aaye mujhe khoobi hai in shero me
Comment by इमरान खान on June 12, 2011 at 10:20am
बहुत शुक्रिया गणेश जी क्या यह रचना गजल की श्रेणी में आती है..?

कृपया ध्यान दे...

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