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गजल( वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा)

2122  :    2122         212 

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वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा
और चुप हो आसमां सोया रहा।1

आँधियों में उड़ गये बिरवे बहुत
साँस लेने का कहीं टोटा रहा।2

डुबकियाँ कोई लगाता है बहक
और कोई खा यहाँ गोता रहा।3

पर्वतों से झाँकती हैं रश्मियाँ
भोर का फिर भी यहाँ रोना रहा।4

हो गयी होती भली अपनी गजल
मैं पराई ही कथा कहता रहा।5

चाँदनी छितरा गयी अपनी सिफत
गिनतियों में आजकल बोसा रहा।6

पोंछ देता अश्क मुंसिफ,था सुना,
वज्म में करता वही सौदा रहा।7

मर्तबा जिसको मिला,सब भूलकर
रास्तों पर किर्चियाँ फैला रहा।8

दिन तुम्हारे भी फिरेंगे,यह सुना
आदमी को आदमी फुसला रहा।9
@

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2017 at 7:48pm

आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें । आ. समर भाई जी की सलाहों कर गौर कीजियेगा ।

Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 6:43pm
जैसे,मतले के सानी में 'हो'शब्द भर्ती का है,'हो'की जगह 'ये'होना चाहिये ।

'हो गई होती भली अपनी ग़ज़ल
मैं पराई ही कथा कहता रहा'

इस शैर में शुतरगुर्बा का दोष है,ऊला यूँ होना था:-
'हो गई होती भली मेरी ग़ज़ल'
Comment by narendrasinh chauhan on May 22, 2017 at 6:28pm

लाजवाब रचना 

Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 4:15pm
बहुत बहुत आभारी हूँ आदरणीय समर साहिब।कृपया कुछ इंगित करते,तो सहूलियत होती,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 4:14pm
आभार आदरणीय आरिफ भाई।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 2:41pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें ।
शिल्प पर ध्यान देने की ज़रूरत है ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 1:06pm
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, बहुत बेहतरीन प्रयास । बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ,इंतज़ार करें ।

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