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खेतों में चलते हैं
हल जब भी
पसीना बहता है
मिट्टी में घुल मिलकर
लहराती फ़सल की देता सौगात है

धूप की तपिश
बरसात होती वरदान
थके कदमों को
बड़े वृक्ष देतें हैं छाँव

कुदरत के बिना
जीना होगा असम्भव
फिर कैसा घमण्ड
कैसा गुरुर

ज़मीन सभी की
पेड़ सभी के
छोटे बड़ों की
क्या होतीं हैं पहचान ?

ज़मीन भी यहीं
आसमान भी
फिर यह कैसी सोच
कि किसी एक को
मिल रहा सरंक्षण आसमान का

जो नहीं किसी काबिल
मिल रही छाँव उसको
है वट वृक्ष की ।

क्या क्रोध है यह
या किसी तूफ़ान के आने का अंदेशा
हर तरफ़ ज़िन्दगी चल रही
क्या होगा आगे क्या जाने ।

कौन होता है अमर कभी
जो आया है जायेगा एक दिन
शाश्वत सच है
फिर किसी
ज़मीन को
जीवन भर किसी का कह देना
कितना उचित ।

पेड़ की छाँव में
एक छोटा सा बीज
जिसको बोया गया किसी माली के द्वारा
पूछ रहा है यह प्रश्न
उस ज़मीन से
और उस ज़मीन
पर खड़े उन सभी
विशाल पेड़ों से ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on July 3, 2017 at 10:51am
पर्यावरण को समर्पित इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना जी .
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 30, 2017 at 11:38pm

सादर धन्यवाद आदरणीय योगराज प्रभाकर सर | 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 30, 2017 at 11:37pm

धन्यवाद आदरणीय तस्दीक साहब |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 30, 2017 at 11:37pm

धन्यवाद आदरणीय नविन मणि त्रिपाठी जी आपको कविता पसंद आयी सार्थक हुआ यह प्रयास |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 30, 2017 at 11:36pm

धन्यवाद आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब आपको कविता पसंद आई सार्थक हुआ मेरा प्रयास |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 8:09pm
मुहतर्मा कल्पना साहिबा, कविता के माध्यम से अच्छी मंज़र कशी की है आपने ,सुन्दर प्रस्तुति पर मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Naveen Mani Tripathi on April 21, 2017 at 12:08pm
बहुत खूब लाजबाब प्रस्तुति ।
Comment by Mohammed Arif on April 21, 2017 at 10:54am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब, आपकी कविता में प्रकृति के ख़त्म होते उपादानों के प्रति चिंता हम सबकी की चिंता है । आज आवश्यकता है जल,जंगल और ज़मीन को बचाने की । बेहतरीन पर्यावरणीय कविता । हार्दिक बधाई ।

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